अग़रचे ये बात होती,
दिन में ग़र रात होती,
तो रात कभी ना सोती,
जो रात कभी ना सोती,
वो रात रात ना होती,
जब रात रात ना होती,
बातों की बात ना होती,
जो अगर बात ना होती,
रात, सारी रात भर रोती…
रात होती, कहानी होती,
कहानी में रानी होती,
और इक राजा होता,
रानी का वो राजा होता,
या राजा की रानी होती,
होती जो कहानी होती,
रात की ज़ुबानी होती,
तब दिन ख़ामोश रहते,
रात इक कहानी कहती,
अबके सावन मनभावन,
उमड़ घुमड़ छाये बादल,
घटा घनघोर काली छाई,
देखो दिन में रात आई,
छुप गयीं सब परछाईं…
उजाले में दिन के मगर,
होती उजली रात होती,
उजली अगर रात होती,
वो रात क्या ख़ाक होती?
नहीं मगर ये बात होती,
के दिन में कभी रात होती,
रात तो बस रात में होती…
पेड़ जब तक हैं हरे,
तब तक हैं सीधे खड़े,
पेड़ों पर है हरियाली,
कहानियां सुनने वाली,
पीपल की दास्तां होती,
बरगद पे वो जा ठहरती,
रात रजनी चंदा देखती,
रजनीगंधा सी महकती,
रात भी होती मतवाली,
दरख़्त भी मनाते दिवाली…
कहते हैं मनुशरद…
अग़रचे ये बात होती!!!
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava