नज़रों का इल्म!!!
कभी कभी अपने पर यकीं करने में,जाने क्यों किसी का दख़ल चाहते हैं, मेहनत से बनाई हुई इस ज़िंदगी में,किसी की तौसीक़ क्योंकर चाहते हैं, …
कभी कभी अपने पर यकीं करने में,जाने क्यों किसी का दख़ल चाहते हैं, मेहनत से बनाई हुई इस ज़िंदगी में,किसी की तौसीक़ क्योंकर चाहते हैं, …
दीवार पे चींटी देख कहते हैं,हमारे घर है हाथी आया! दाना ले जाती चींटी से बोले,हाथी जैसा क्योंकर खाया! लगी सोचने कुछ कहा नहीं,वो अपनी …
गुज़र रहे थे उस गली,जो थी वीरान पड़ी,सामने थी वो खड़ी,अकस्मात् देख उसे,हमने पूछा कौन हो,वो बोली…ज़िंदगी!हमने कहा किसकी?वो बोली…तुम्हारी… हाथ पैर कांपने लगे,सिहरन सी …
सुबह से रात बीच शाम होती है,ज़िंदगी ख़बरों में तमाम होती है, वक़्त की मियाद तय है आख़िर,फ़िज़ूल ख़र्ची देख हैरान होती है, हां हैं …
काठ चिरैय्या इक बना,बढ़ई ने दो पंख दिए लगा,कान में उसके जा फूंका,उड़ जा दूर कहीं उड़ जा,वो जा बैठी देख दरख़्त बड़ा… ऊपर से …
कुछ दीवानों का साथ अज़्मत है,कोई बात है उनमें जो शानदार है, कहीं से कहीं खींची बातों में,जो मुज़्मर है, वही यादगार है, तजवीज़े मिली …
क्या ख़ूब सोचकर भेजी ज़िंदा वो तस्वीर,मुहब्बत की जीती जागती उम्दा वो तस्वीर, बे इंतेहा तड़प के साथ ये कह रही तस्वीर,हर सितम पर मुस्कुराती …
कुछ कम रह गया, कम रह ही है जाता, कम रहना है पूरा होने के तरफ़ का इशारा…मगर कभी पूरा नहीं हो पाता। कम होना …
करने लगे सजदा,धीमे से आवाज़ आई,ऊपरवाला ऊपर रहता,उठ खड़े हुए फ़ौरन,दोनों हाथ उठा कर,मांगने लगे दुआ… चल रहा रतजगा,कर्कश ध्वनि में,चीख चीख बताते व्यथा,हो हल्ला …
सामाजिक व्यवस्थाओं के बीच रह कर मध्यमवर्गीय समूहों की विवेचनात्मक अवस्था चरमराती सी दिखती है.…मगर ऐसा है नहीं…इक नई चेतना अपने पैर पसार रही है …