मनु शरद

ज़िंदगी की सरजमीं पर...

मनु शरद

नज़रों का इल्म!!!

कभी कभी अपने पर यकीं करने में,जाने क्यों किसी का दख़ल चाहते हैं, मेहनत से बनाई हुई इस ज़िंदगी में,किसी की तौसीक़ क्योंकर चाहते हैं, …

दीवार पे चींटी!!!

दीवार पे चींटी देख कहते हैं,हमारे घर है हाथी आया! दाना ले जाती चींटी से बोले,हाथी जैसा क्योंकर खाया! लगी सोचने कुछ कहा नहीं,वो अपनी …

पलक झपकते ही!!!

गुज़र रहे थे उस गली,जो थी वीरान पड़ी,सामने थी वो खड़ी,अकस्मात् देख उसे,हमने पूछा कौन हो,वो बोली…ज़िंदगी!हमने कहा किसकी?वो बोली…तुम्हारी… हाथ पैर कांपने लगे,सिहरन सी …

नफ़ासत!!!

क्या ख़ूब सोचकर भेजी ज़िंदा वो तस्वीर,मुहब्बत की जीती जागती उम्दा वो तस्वीर, बे इंतेहा तड़प के साथ ये कह रही तस्वीर,हर सितम पर मुस्कुराती …

क्या फ़ायदा!!!

करने लगे सजदा,धीमे से आवाज़ आई,ऊपरवाला ऊपर रहता,उठ खड़े हुए फ़ौरन,दोनों हाथ उठा कर,मांगने लगे दुआ… चल रहा रतजगा,कर्कश ध्वनि में,चीख चीख बताते व्यथा,हो हल्ला …

चेतनात्मक मंथन!!!

सामाजिक व्यवस्थाओं के बीच रह कर मध्यमवर्गीय समूहों की विवेचनात्मक अवस्था चरमराती सी दिखती है.…मगर ऐसा है नहीं…इक नई चेतना अपने पैर पसार रही है …