मुआ’शरा(समाज)!!!
सुबह से रात बीच शाम होती है,ज़िंदगी ख़बरों में तमाम होती है, वक़्त की मियाद तय है आख़िर,फ़िज़ूल ख़र्ची देख हैरान होती है, हां हैं …
सुबह से रात बीच शाम होती है,ज़िंदगी ख़बरों में तमाम होती है, वक़्त की मियाद तय है आख़िर,फ़िज़ूल ख़र्ची देख हैरान होती है, हां हैं …
कुछ कम रह गया, कम रह ही है जाता, कम रहना है पूरा होने के तरफ़ का इशारा…मगर कभी पूरा नहीं हो पाता। कम होना …
सामाजिक व्यवस्थाओं के बीच रह कर मध्यमवर्गीय समूहों की विवेचनात्मक अवस्था चरमराती सी दिखती है.…मगर ऐसा है नहीं…इक नई चेतना अपने पैर पसार रही है …
दिवस आज है माँ का, तो कल दिवस था किसका और कल दिवस होगा किसका…और उसके पीछे के पल और आगे आने वाले कल, क्या …
जिंदगी ब्याज पे और प्याज पे चलती है,छौंके साथ में लौकी आलू मेथी बनती है, आलू रोजमर्रा की दिनचर्या की सब्जी है,बाकी सब्जियां उसी में …
पुरानी बात है और है भी सच, किसी की आंखो देखी है शायद, और हर कालखंड के लिए सार्वभौमिक लगती है… बया के बच्चों को …
डरो के डरने का मौसम है…हरदम ये तौलते रहो कि किसमें कितना दम है… कोख में थे तो माँ डरी हुई थी, ठीक ठाक तंदुरुस्त …