काठ चिरैय्या इक बना,
बढ़ई ने दो पंख दिए लगा,
कान में उसके जा फूंका,
उड़ जा दूर कहीं उड़ जा,
वो जा बैठी देख दरख़्त बड़ा…
ऊपर से उसने जो नीचे झांका,
ढेरों कौव्वों की लगी थी सभा,
कोई किसी की नहीं सुनता था,
हर इक की अपनी थी ढपली,
हर इक को राग था आलापना…
कुछ कर रहे थे कांव काँव,
उन्हें चिंता सताती अपने गांव,
चाहते थे वो के निकले सुझाव,
चाहे खड़ा होना हो उलटे पांव,
मगर भला हो जाये उनके गांव…
अभी ऊपर बैठी काठ चिरैय्या,
सोचने लगी, इसे कहते समस्या?
यहां कोई किसी की नहीं सुनता,
फिर समाधान का क्या है रस्ता,
कैसे कोई समाधान निकलेगा…
अभी अभी तो उसमें फूंकी जान,
बढ़ई को नहीं था ज़रा अनुमान,
काठ चिरैय्या के उभरा ज्ञान,
ना कोई हल ना इसका निदान,
क्या करे बढ़ई बताओ भगवान…
उधर सभा में अचानक इक कौव्वा,
कांव कांव की जगह लगे भौंकना,
दूर शाख़ पे बैठी थी इक मैना,
बोली नहीं गजब इनका भौंकना,
इन्हें कुकुरों के साथ आ गया रहना…
काठ चिरैय्या का हतप्रभ होना,
कुकुर फ़ितरत में ये सिफ़त होना,
कौव्वों को मिला कुकुर मोहल्ला,
उन्हें आ गया कुकुर सा भौंकना,
बातचीत नहीं, बस बहस का होना,
नतीजतन नतीजा ना मुक़्क़मल होना…
नहीं लगता है मेरा कोई ठिकाना,
बेहतर वापस काठ का बन जाना,
जब कौव्वे कांव कांव थे करते,
और कौव्वे कौव्वे जैसे थे लगते,
कुकुर से मिल सीख गये भौंकना,
अधूरा रह गया गांव का सपना…
बोली मैना, बढ़ई है ऊपरवाला,
फूंकता जान और देता निवाला,
काठ काष्ठ कर जीवन डाला,
रख भरोसा उसके पास है हाला,
हां मगर थोड़ी तो होती है चिंता,
कैसे धरती पर जीवन चलेगा…
बढ़ई उधर बैठ रहा सोचता,
कि ‘भेजा’ बस इंसान को दिया,
वरना यहां पे मचता कोहराम,
जो इंसानों में रहता सुबह शाम,
कौव्वों को बस इतना सीखना,
करें कांव कांव, नहीं भौंकना,
इक दूजे बग़ैर नहीं कुछ होना,
समस्या निदान बिन कांव कांव,
खुशहाली बरसेगी उनके गाँव…
काठ चिरैय्या ने ठहर के सोचा,
बढ़ई अगर मेरे पर काट देगा,
कैसे देख सकूंगी मैं ये मजमा,
बिन बात बहस पे बहस करना,
नहीं मुझे अब काठ की बनना,
जीवन रसबोध का स्वाद चखना,
दुनिया है तो मैं हूँ वरना कुछ ना…
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava