पलक झपकते ही!!!
गुज़र रहे थे उस गली,जो थी वीरान पड़ी,सामने थी वो खड़ी,अकस्मात् देख उसे,हमने पूछा कौन हो,वो बोली…ज़िंदगी!हमने कहा किसकी?वो बोली…तुम्हारी… हाथ पैर कांपने लगे,सिहरन सी …
गुज़र रहे थे उस गली,जो थी वीरान पड़ी,सामने थी वो खड़ी,अकस्मात् देख उसे,हमने पूछा कौन हो,वो बोली…ज़िंदगी!हमने कहा किसकी?वो बोली…तुम्हारी… हाथ पैर कांपने लगे,सिहरन सी …
कुछ दीवानों का साथ अज़्मत है,कोई बात है उनमें जो शानदार है, कहीं से कहीं खींची बातों में,जो मुज़्मर है, वही यादगार है, तजवीज़े मिली …
ज़िंदगी ज़रा देर जो बैठी सुस्ताने,लगी उठने तो पैर लगे कँपकपाने, उसने भरोसा दिलाया इत्मिनान से,कराहना छोड़ कर लगी मुस्कुराने, यक़ीं पर गर्द जल्द बैठ …
कैनवास पे रंगों के छींटे यूं हैं उड़ेले,के ज़िंदगी ने कहा चलो इनमें रंग भरें, आबशारों को देख रहे उल्टे पड़े हुए,लगे के जैसे आसमां …
ख़ुद पे ना गुज़रे, मुश्क़िल है समझ पाना,हैं हज़ारों जिन्हें मयस्सर नहीं इक दो दाना, नहीं हासिल, जिसे अच्छा कहे ज़माना,है मुफ़लिसी वो दाग़, मुश्क़िल …
मौलिक विचारों की पैदाईश भी जन्म के साथ ही हो जाती होगी, ऐसा मेरा मानना है…अब होता है ऐसा कि नहीं ये तो शोध का …
उसने कहा अपने घर आ कर,कि मैं अपने घर से आ रही हूं,मुझे दो पल लेने दो सुकूं ज़रा,बेहद थकी हूं, टूट के आ रही …
कल शाम, कल रात से बात हुई,सोचती रही रात मगर नहीं सोयी,वक़्त था तक़रीबन रात के ढाई,अल्लाह दुहाई अल्लाह दुहाई,नींद आ कर भी नहीं आई,सख़्त …
कितने ही सच, झूठे देखे,बिखरे बिखरे से टूटे देखे,किसी को क्या पता था,किसी ने ख़्वाब सुनहरे देखे… कुछ सच्चे लोग, झूठे देखे,फ़रेबी नहीं थे, फ़रेब …
लग रहा था ऐसा,जा रहा था जला,अंदर ही अंदर… कुछ था भी ऐसा,कि पता ना चला,उबल रहा बवंडर… मनजला मनचला,दिल को गया बना,खंडहर ही खंडहर… …