मनु शरद

ज़िंदगी की सरजमीं पर...

मनु शरद

नफ़ासत!!!

क्या ख़ूब सोचकर भेजी ज़िंदा वो तस्वीर,मुहब्बत की जीती जागती उम्दा वो तस्वीर, बे इंतेहा तड़प के साथ ये कह रही तस्वीर,हर सितम पर मुस्कुराती …

क्या फ़ायदा!!!

करने लगे सजदा,धीमे से आवाज़ आई,ऊपरवाला ऊपर रहता,उठ खड़े हुए फ़ौरन,दोनों हाथ उठा कर,मांगने लगे दुआ… चल रहा रतजगा,कर्कश ध्वनि में,चीख चीख बताते व्यथा,हो हल्ला …

चेतनात्मक मंथन!!!

सामाजिक व्यवस्थाओं के बीच रह कर मध्यमवर्गीय समूहों की विवेचनात्मक अवस्था चरमराती सी दिखती है.…मगर ऐसा है नहीं…इक नई चेतना अपने पैर पसार रही है …

दर्जन भर दर्द!!!

दर्जनों में दर्द,सैकड़ों में ख़ुशी,जो कुछ बची,ज़िंदगी ही होगी… आसमाँ बिछा कर,चादरें समेट लीं,पैर पसारने की,जगह नहीँ छोड़ी… पी गये हैं दरिया,समंदर है बाक़ी,छोटे से …

ये साये हैं!!!

ये साये हैं परछाइयों के,ये पाये(पैर) हैं गहराइयों के,बड़ी देर से ढूढ़ें उचाईयों को,यहां साये कतराते हैं रुसवाइयों से … ये साये हैं….. ये रास्ते …

कचोट!!!

किसी चेहरे पे क़शिश ऐसी पाई,ज़हन में उतरी, ज़िंदगी मिल गयी, जिनसे मिले, परछाईं दिखे उनकी,मिले उनसे तो दुनिया खिल गयी, आग़ोश में दम टूटता …

मायूस कुन बातें!!!

ज़िंदगी ज़रा देर जो बैठी सुस्ताने,लगी उठने तो पैर लगे कँपकपाने, उसने भरोसा दिलाया इत्मिनान से,कराहना छोड़ कर लगी मुस्कुराने, यक़ीं पर गर्द जल्द बैठ …