ज़िंदगी की सरजमीं पर...
इक रहिन घोंघा!!!
इक रहिन घोंघा!!!

इक रहिन घोंघा!!!

इक रहिन घोंघा, भई इक रहिन घोंघा,
वही जिनहिं की पीठ पै शंख रहा उभरा,

बात चली के का कारज्यक्रम आज का,
बोलै हलुवा पूड़ी संग बस खावैगें  मेवा,

घोंघा के रिस्तन में सबहिं आला फूंसा,
घोंघा के भेजन में बस भरा रहिन भूसा,

घोंघा तो होत है भई, आख़िर में घोंघा,
बचपनै से उनके सिर बैठा उल्टा लोटा,

इक दिन लगै बोले जिंदगी का फलसफा,
उठौ घूमौ फिरौ, अलावा कुछ नहीं रखा,

हो सकै तो बूझौ अकिल बड़ी कै कीला,
अकिल लगहियो, वरना चुभ जाई कीला,

गये खेतिहन में देखै, का का फल रहा,
गन्ना गेहूं सरसों पीली बाजरा चहक रहा,

कहिन चलो देखै चलें सब कोई मेला,
मेला में लगा रहा बाइस्कोप का रेला,

दिखावत रहा उमें दुनिया का झमेला,
घोंघा हुई गये चकित देख कै ये लीला,

बोलै बम्बई जाई का है तुरंतहि हमका,
हमहूं बोलन लगिहै बस उनके सरीका,

कोई तो होइये हुआं जो समुझिये हमका,
हियां सब कहित हैं भेजा में गोबर भरा,

घोंघा रहै मौज मा, बरसन लागै मेघा,
मौज में उ दूसर के दिखावै लागै ठेंगा,

बिनम्रता से कह गये गैय्या हमरी माता,
सिवाय इसके हमको कुच्छो नहीं आता,

गुरुजी बोलै, बेटा हो जीरो बटा सन्नाटा,
मनई मन हंसै, इनकौ भी कुछ नहीं आता,

जिंदगी बसर करै का उनका है तरीका,
रोज रोज मरे से भला है कौनो फायदा,

दुनियादारी ‘का’ है, ई समझन लगै घोंघा,
बस मनहि ना माने, के सयाने भये घोंघा,

बहुतै बिचार कर सोचा, होगा सो होगा,
हमका तो नाज है, हम कहलाते हैं घोंघा,

काफी तीखी सरीखी घोंघा की दिनचर्या,
कभी बैठे इस मोहल्ला कभी उस चबूतरा,

निदान भले ना हो किसी की समस्या का,
बखत बे बखत हर बखत खड़े रहिन घोंघा,

सीधी सी चाल उनकी नहीं कोई छलावा,
घोंघा, आपन मस्ती में, शंख रहे बजावा,

इक दिन इक परी ने जो हिरदय में झांका,
जिंदगी का मकसद मिला, उ भईन बांका,

मेहनत औ मसक्कत कर, खुद को हांका,
ना तरसै घोंघा खुद पै, ना ही कुछौ ढांका,

उमर रहते बदलाव संग बदल गये घोंघा,
घरै के घोंघा को कोई ना पहिचान सका,

सब मिल चावल फेंको दिन बहुरै उनका,
ऊपरवाला मेहरबान जब, दिन बदले घोंघा,

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

One comment

  1. Kranti

    घोंघा की बात ही कुछ और है, वाह रि घोंघा जवाब नहीं तुम्हारा ,,,
    बहुत ही मजेदार रचना,,

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