जाने कितना पराया वो हमको कर गया,
जब वो तुम से, आप, हमको कर गया,
दौरान ए गुफ़्तगू इस कद्र हैरां कर गया,
वो नज़रों से बग़ावत जो बयां कर गया,
कुछ यूं वो हमपे अपनी अदा धर गया,
जानता कब था वो मेरा ख़ुदा बन गया,
बग़ैर उसके मुमकिन ना था मेरा गुज़ारा,
ये जानते हुए भी वो मुझे बेचारा कर गया,
भरी महफ़िल में मैं तन्हां खड़ा रह गया,
यार जाने किस बात पर अड़ा रह गया,
कभी ना चाहा था के उससे होंगें जुदा,
हम हीं को मगर वो ख़ाक़सार कर गया,
इक ही ज़िंदगी में पूरी ज़िंदगी मिली थी,
वो फिसलती गयी मैं हाथ मलता रह गया,
वो जानता था के वो है मुहब्बत मेरी,
जाने क्यों मगर, मैं उसे खलता रह गया,
बहुतों से उलझ सके, सिवाय उसके,
सारी उम्र वो हमको सुलझता रह गया,
तय ये हुआ के बहिश्त में मिलेंगे हम,
वो ज़मीं आसमां इक करता रह गया,
मुत्तालिक़ इसके और कोई बात ना हुई,
बिन बोले वो मेरी पेशानी पढ़ता रह गया,
चंद रोज़ गुज़रे हैं इक उम्र निकले हुए,
पल इक इक कर, ज़माना गुज़र गया,
ऊहापोह में इसी तरह दिन गुज़रते गये,
तमाशबीन ही तमाशा बन के रह गया,
बहुतों से मुत्तासिर हुए “मनुशरद” मगर,
वो इक ही सारा आलम रौशन कर गया,
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava
Behtareen….” Uhapoh”