ज़िंदगी की सरजमीं पर...
ए ज़िंदगी!!!
ए ज़िंदगी!!!

ए ज़िंदगी!!!

शाइस्ता ही सही आहिस्ता ही सही,
करती रहना हैराँ, हर रोज़ ए ज़िंदगी,

कभी रूठना, मान जाना भी कभी,
चाह के हमें मनाती रहना ए ज़िंदगी,

यूँही इतराना, शर्माना भी तुम यूँही,
ख़ामोश चुप चली आना ए ज़िंदगी,

जुस्तजू में तू , ज़िंदगी ख़ातिर तेरी,
आवारगी से रूबरू रहना ए ज़िंदगी,

ना किसी ने देखी ना कोई देखेगा ही,
दीवानगी की हदें पार कर ए ज़िंदगी,

नहीं कोई तेरे जैसी कभी भी कहीं,
हैरान हूं, तू और हैराँ कर ए ज़िंदगी,

देख मेरी, ये तड़प और ये क़शिश,
ख़्वाहिशों  से भरी रहना ए ज़िंदगी,

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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