ज़िंदगी की सरजमीं पर...
दरख़्त के पास वाली दुकान!!! भाग १
दरख़्त के पास वाली दुकान!!! भाग १

दरख़्त के पास वाली दुकान!!! भाग १

दरख़्त के पास वाली दुकान से,
कुछ ख़रीद रहा था जब पहुंची मैं,
देखा भी ना था मैंने उसे ग़ौर से,
और क्यों ही देखूं किसी को मैं?
जब जानती तलक नहीं थी उसे,
कौन है? ये क्योंकर ही जानूं मैं,

पर इतना कौन सोचता है,
कभी किसी के बारे में,
यही सोच कर हैरां थी मैं,
कि क्यों सोच रही थी मैं,
इतना कुछ किसी के बारे में,
जबसे देखा था उसे बाज़ार में,

उसका हाथ छू गया था जबसे,
खड़े खड़े वहीं दुकान में,
शायद ग़लती से, (उफ्फ़ ये ग़लती)
इक सिहरन सी दौड़ गयी अंदर मेरे,
जाने क्यों! ना ही जानूं क्यों,
वो छुवन अच्छी लगी थी मुझे,

जुम्बिश! हाय वो जुम्बिश,
हाथ की, साथ की उसके,
चला गया वो जब दुकान से,
बेसुध सी खड़ी रह गयी वहीं मैं,
बिना जाने कि वो जा चुका है,
स्पर्श की झनझनाहट सुनी मैंने,

थक हार के दुकानदार ने,
थोड़ा झुंझला के पूछा मुझसे,
आपको आख़िर क्या चाहिये,
अनायास ही बोल पड़ी थी मैं,
वो जो चला गया वही चाहिये,
हद्द तो देखो, कैसे कह गयी मैं,
ये सोच शरमा के सिहर गयी मैं,

वक़्त गुज़रा दिन बदले,
पर उस पल की याद ना मिटे,
इक चेहरा बस गया था मन में,
सिवा इसके, उसके बारे में,
कुछ भी तो नहीं जानती थी मैं,
इक टीस इक आस थी पाली मैंने…

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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