ज़िंदगी की सरजमीं पर...
दरख़्त के पास वाली दुकान!!! भाग १४
दरख़्त के पास वाली दुकान!!! भाग १४

दरख़्त के पास वाली दुकान!!! भाग १४

अगले दिन पहुंच गई मैं जल्दी, उनके आने से,
पर मैं ये भूल गई थी कि जाना है पहले पढ़ने,
उनसे तो मिलेगें अब हम सारा दिन गुज़रने पे,
शाम हुई तो फिर बात हुई आज हैं व्यस्त थोड़े,
चलो बाहर तक चलें ख़ुद ही वो आ कर बोले,
ये क्या हुआ अचानक उन्हें, मैं थी सकते में,
क्या वो भी वही सोच रहे होंगे जो सोचती हूं मैं,
थोड़ा सा दिल पर धीरज धर हम साथ चल दिये,
कुछ भी परवान ना चढ़ा मगर हाय ये सिलसिले,
क़ाश के मंज़िल ना आये बस चलते रहें ये रास्ते,
नहीं पाना मुझे कुछ भी ना ही मुझे कुछ चाहिये,
देखा इकबार मैंने उनकी तरफ़ तिरछी निगाह से,
नज़रें मिलते ही लगा वैसे जैसे लगा पहली दफ़े,
बात नहीं हुई मगर सदियां गुज़र गईं साथ उनके,
कुछ ही पलों में हम बाहर आ गये थे टहलते हुए,
बस हुआ इतना कि चलो चलते हैं कल मिलेंगे,
इतनी ख़ुशी महसूस हुई, जो अन बयाने बन है,
दो चार क़दम हम खिसके होंगे उनसे विदा ले के,
अपना नाम जो सुनाई दिया फ़ौरन देखा पलट के,
अरे! मुझे लगा कि आप बुला रहे थे, पूछा मैंने,
इकदम साफ़ मुकर गये और चले मुंह मोड़ के,
मैं भी सोच में पड़ गई कि क्या कान बजते हैं मेरे,
अरे नहीं, सुना तो था वो बुला रहे हैं मुझे नाम से,
इतना भी होश नहीं खोया यही सोचती रही थी मैं,
और आहिस्ते आहिस्ते अपने घर को चल दी थी मैं,

अगले दिन शाम को जब पढ़ने पहुंची मैं उनसे,
देखा चेहरे पर भाव हैं कुछ हल्क़े भारी गहरे से,
हममें ईश्वर ने गुण दिए हैं नहीं दूसरों के बस में,
यानि हम समझ जाते हैं भावों के बीच के मायने,
यक़ीनन कल जो आवाज़ सुनी थी उनकी मैंने,
मैं भांप गई थी के हो ना हो ये तो आप ही थे,
अजीब ओ ग़रीब ख़ामोशी तैर रही दरमियां हमारे,
हम सोचते थे वो सोचते हैं के वो मेरा नाम पुकारे,
हल्क़ी सी खखारने की आवाज़ सुनायी दी मुझे,
सामने हैं और शायद हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं,
अरे, वो कह क्यों नहीं देते क्योंकर छिपा रहे हैं,
अगर बस चले मेरा तो उनके मन की कह दूं मैं,
अक़्सर बातों बातों में लगता है क्या? कह दूं मैं,
घर गया था, इसी बीच आहिस्ते आवाज़ में बोले,
अब बतायेंगे बारे में अपने, लगा मुझे इकदम से,
दिल मुँह को आया कहीं वही ख़ुशी ना ज़ाहिर करें,
चाहती भी थी सुनना और नहीं भी चाहती थी मैं,
बड़ी असमंजस सी स्थिति से गुज़री उस वक़्त मैं,
मद्धम मद्धम सी आवाज़ घुल सी गई कानों में मेरे,
के बहन का रिश्ता तय करने गये थे कहा उन्होंने,
क्या ना मांग लिया होता उस पल ईश्वर से मैंने,
बस इतना ही गुनगुना सकी कि तू सबकुछ है,
प्रार्थनाएं ऐसे भी सफल होती हैं ये जाना अब मैंने,
फिर उसी मन की अवस्था में इकबार ताका उन्हें,
वो नज़रें मिलते ही इकदम हड़बड़ा से गये थे,
मैं भी ज़रा सकुचाई सी गई थी नज़रें मिलने से,
उस वक़्त इक गुड़गुड़ाहट सी थी मेरी क़ैफ़ियत में,
होता ही होगा ऐसा ये सोच के लगी थी मुस्कुराने,
इतनी हिम्मत ही नहीं हुई कि नज़रें उठाती मैं,
तिरछी नज़रों से टुकटुक देख रहे थे जान गई मैं,
ऐसी अनुभूति सी गुज़र रही थी मैं पहली दफ़े,
देखा जो उनकी ओर वो भी लगे उसी अवस्था में,
कई बार सोचती थी मैं कि मुहब्बत क्या है?
लगता है कि आज समझ रही हूं ज़रा ज़रा उसे,
उस वक़्त वहां से इकदम भाग जाना चाहती थी मैं,
और कमरे में आ कर ख़ुद पर इतराना चाहती थी मैं,
हवा में सौंधी सौंधी सी सुगंध महसूस कर रही थी मैं,
अगर इसे कहते हैं नशा तो नशे में झूम रही थी मैं,
इजाज़त ले रही हूं जाने की कुछ यूं पूछा मैंने उनसे,
कि जवाब वही आये उनसे जो सुनना चाहती थी मैं…

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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