यूं जाने का मन तो था नहीं, पर था भी वहां से,
कभी कभी कुछ अनुभूतियों को स्वीकारने में,
ख़ुद के साथ वक़्त चाहिये उसे जज़्ब करने में,
और उस वक़्त कोई नहीं होना चाहिये वहां पे,
चलती हूं मैं, ये कह कर वहां से चल तो दी थी मैं,
और उठते उठते ये कहते हुए सुना था मैंने, उनसे,
कल ज़रा जल्दी ही आ जाना, फिर जाना है मुझे,
जिस क़ैफ़ियत में थी उस दौरान मैं , यूं लगा मुझे,
कि हम मिलते रहें यूंही और बातें भी यूंही होती रहें,
चाल में मस्ती की कुलाचें भरती हुई चली वहां से मैं,
अब तो क़िला फ़तह हुआ, समझा रही ख़ुद को मैं,
घर पहुंच कर मैंने, गरम चाय बनायी सबसे पहले,
आराम कुर्सी पे लेट गई चाय की चुस्कियां लेते लेते,
सामने वो बैठे हैं साथ चाय पीते हुए सोच रही थी मैं,
जाने कब आंख लग गयी और बेहोश सो गयी थी मैं,
खुली नींद, बाहर अंधेरा था, मन मयूर रहा नाचे डोले,
क़लम उठा लिखना चाहा जो शाम से रात हुई हौले से,
कहिये क्या कहते हैं आप, आईने में पूछ रही ख़ुद से,
थोड़ा शरमाना थोड़ा इतराना चलता रहा देर रात में,
अब जब सोये ही थे पौ फटते तो नींद कैसे ही खुले,
मुहब्बत मजबूर करती है, मजबूरी अच्छी लगती है ये,
उस गुड़गुड़ाहट का क्या कहना जो परेशान रखती है,
हाँ हैं वो मुझे पसंद, हैं बहुत ही पसंद तो क्या करूं मैं,
ये कैसी उलझन कि बग़ैर इस उलझन के कैसे रहूं मैं,
ना मिलें तो परेशानी मिलो तो लगे दूर जाना है उनसे,
चाहती हूं वो हाथ पकड़ लें मेरा पर छुड़ाउँगी मैं कैसे,
कैसी ऊहापोह है जो पल पल भटका रही है मुझे,
नींद भी नहीं होने देती पूरी झोंको में सुला रही है मुझे,
सवेरे सवेरे के सूरज से ऊर्जान्वित हो कर उठी मैं,
है ये कैसी विडंबना है कि रात भर जो सोयी नहीं मैं,
कि सवेरा इतना ताज़ा होगा सोच नहीं पा रही थी मैं,
सवरने और सजने में आज क्यों कर वक़्त लगा मुझे,
मैं चल पड़ी ज़ोर शोर से विश्विद्यालय यही जानने,
कि क्यों जल्दी बुलाया है मुझे, कहां जाना है उन्हें,
अचानक आपको लगने लगता है अधिकार दूसरे पे,
क्या इसी को कहते हैं इश्क़ क्या मुहब्बत कहते इसे,
ये मैं नहीं जान पाई मगर इतना तय है कि अंदर मेरे,
इक जलन सी पनप रही है अपनेपन की ले कर उन्हें,
क्या ये स्वाभाविक है या कोई और अनुभूति है घेरे,
नहीं नहीं ये जलन बता रही है कि आप हैं बस मेरे,
मैं कभी नहीं चाहती थी, ये अनुभूति पनपे अंदर मेरे,
पर जलना इश्क़ में स्वाभाविक है अब पता चला मुझे,
उस सफ़र की डगर का रास्ता ही है कुछ इस तरह से,
कि दरिया है आग का और बुझाना है मिल कर उसे,
इसे ही कहते हैं मुहब्बत और है ज़ोरदार हमें उनसे,
बदन में थी कंपकंपी, जल्दी बुलाया है क्यों कर के,
और सिहरन सी दौड़ रही थी रगों में ये क्या मसला है,
जैसे तैसे कुछ दौड़ के हांफते हुए पहुँची कमरे में,
थे नहीं वहां पर, वो शायद गये होंगे किसी काम से,
दो घूंट पानी पी कर मैं चैन की सांस लगी थी भरने,
इक प्रोफ़ेसर अंदर आईं कमरे में पूछने उनके बारे में,
इक़दम हकपका गयी थी मैं पर संभाला जाने के,
मुझे नहीं मालूम कि कहां गये हैं, मैं भी हूं इंतेज़ार में,
उस प्रोफ़ेसर के हाव भाव से लगा कुछ माजरा है,
अंदर अंदर सोच बैठी थी मैं ये शायद जलन ही है,
जो भी हो पप्रोफ़ेसर का आना अच्छा नहीं लगा मुझे,
क़मरे में साथ वाली कुर्सी पर बैठ गईं वो ये कह के,
बेहद ज़रूरी काम है उनको बस इतना कहा मुझसे,
जो परेशानी होती है, ना चाहते हुए किसी के होने से,
हमें भी ख़ासी उलझन सी होने लगी उनके वहां होने से,
बात शुरू कर दी कि मैं कौन हूं क्या हूं, इतने में उन्होंने,
क्या बतायें कि हाथ ही नहीं पहुंचे मेरे उनकी गर्दन पे,
जी मुझे भी ज़रूरी कुछ काम है ये कहा मैंने प्रोफ़ेसर से,
और ये नहीं बताया कि मैं आती हूं पढ़ने रोज़ ही उनसे,
कुछ अनमने से पल गुज़रे उस दरमियां बीच हमारे,
फिर मैं आ गयी कमरे से बाहर, कहते हुए कि काम है,
और सामने के बरामदे से होते हुए बैठ गयी बाग़ीचे में,
ज़रा देर बाद देखा मैंने उन्हें जाते हुए अपने कमरे में,
और बिजली की रफ़्तार से भागी उस ओर उन्हें रोकने,
हांफते हुए बताया कि प्रोफ़ेसर बैठी हैं इंतेज़ार में उनके,
इक़दम ठिठक कर पूछा कोई मैडम तो नहीं बैठी हैं,
मैंने कहा बैठी तो मैडम ही हैं पर नाम नहीं जानती मैं,
क़द काठी जान के वो पलट के चल दिए इशारा करके,
कि मैं भी साथ साथ चलूं उनके जिधर जाने को वो कहें,
ना जानते हुए कि कहां जाना है, मैं साथ हो ली उनके,
चैन आया उन्हें विद्यालय के फाटक से बाहर निकल के,
इतनी तेज़ चल रहे थे हमदोनों कि ग़ौर नहीं किया मैंने,
कि वो मेरा हाथ ज़ोर से पकड़ चल रहे थे इतनी देर से,
कहना चाहा मैंने जब उनसे, देखती हूं लब ख़ामोश रहे…
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava