देखो ना, ख़ुद ही ख़ुद बड़बड़ा रही मैं,
ना जाने क्या क्या कहे जा रही थी मैं,
सुनने वाला नहीं था कोई भी कमरे में,
इसलिये बेधड़क हुई जा रही थी मैं,
मन ही मन थोड़ा घबरा रही थी मैं,
ख़ुद को ही ढांढ़स दिये जा रही थी मैं,
आयेगा वो दिन भी कभी जब मिलेंगे,
कभी तो होगा ऐसा कि हम मिलेंगे,
कभी तो गुल हमारी बगिया खिलेंगे,
कभी तो हम उनसे ख़्वाबों में मिलेंगे,
कभी तो होश में भी हमारे होश उड़ेंगे,
कभी तो क़ाश हाय क़ाश हम मिलेंगे,
और उस खोंचे पे साथ चाय पियेंगे,
यूँही उनके साथ की चाहत हम भरेंगे,
इक दिन ऐसा भी होगा ये वो कहेंगे,
अपने ख़्वाबों की ताबीर साथ करेंगे,
आने वाले पलों की अदावत करेंगे,
गिले शिकवों से बग़ावत हम करेंगे,
के अभी सोच ही रही थी ये सब मैं,
जागती आंखों से ख़्वाब चुन रही मैं,
ख़याल टूटा तो ये ख़याल आया मुझे,
बात इस ख़्वाब से आगे बढ़ेगी कैसे,
वो दुकान की मुलाक़ात रह गयी पीछे,
कोई तो डोर हो जो बात आगे खींचे,
आख़िर इकदिन ये तय किया मैंने,
इश्क़ है मुझे, उसका जानती नहीं मैं,
अब जब मुलाक़ात होगी मेरी उससे,
पूछ ही लूंगी उसका अता पता मैं,
और फिर बेधड़क उससे कहूंगी मैं,
क्या इज़हार नहीं कर सकती पहले,
इंतेज़ार का वक़्त शुरू हुआ तभी से,
कई दफ़े मैंने चक्कर लगाये दुकान के,
पर मिल नहीं पायी कभी भी उससे,
सबकुछ देख दुकानदार समझ गया ये,
फिर बोला इक दिन ठिठक कर मुझसे,
ख़रीदते नहीं, हां रोज़ आते हो दुकान पे?
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava