गुलज़ार होती हुई ज़िंदगी है सामने,
उस कक्षा का रोज़ इंतेज़ार रहता है,
तक़रीबन इक महीना आया गुज़रने,
अभी तलक बात कुछ भी हुई नहीं है,
जैसे उफ़नती नदी रोक नहीं सकती,
मेरी हालत भी बिल्कुल वैसी हो रही है,
इक दिन काम से मैं गयी पूछने उनसे,
दो छोटे फट्टों वाले दरवाज़े में बाहर से,
सब दिखाई पड़े सिवा बैठे हुए चेहरे के,
मैंने दरवाज़ा खटखटाया इजाज़त लेने,
आवाज़ आई के अंदर आ सकते हैं,
मैं खोल दरवाज़ा और आ गई सामने,
बिना सर उठाये इशारा किया, बैठिये,
जैसा मैं भांप रही थी, बाहर खड़े हुए,
वैसा ही नज़ारा निकला उस कमरे में,
वे अपने कमरे में बैठे क़िताब छान रहे,
और केतली में शायद चाय उबाल रहे,
उपर देखा, मेरे हूंहूँ कर खखारने से,
फिर हमारी नज़रों में दो टूक देखते रहे,
ऐसे कि जैसे कोई निस्तब्धता से जागे,
नज़रें हटा कर वो पूछना मुझसे चाहे,
मैंने तुमको कहीं किसी जगह देखा है,
इकदम इकटक लाल हो गयी थी मैं,
क्या ये जानता है दुकान पे हुए किस्से,
इसको याद है शक़्ल मेरी अबतक कैसे?
इक बार जो चीज़ आंखें देख लेती हैं,
भूलती नहीं, कभी ग़ौर ना की थी मैंने,
अब क्या होगा? हाय राम सोच रही मैं,
आँखों में पढ़ तो नहीं लिया कहीं उसने,
के मैं जाती थी तकने उसे दुकान पे,
क्या कर बैठी थी अब ख़याल आया ये,
ये अठखेलियाँ दिल समझें तो कैसे,
बहार आयी हुई है गुलिस्तां में मेरे,
मैं बैठी हूँ सामने उनके,क्या? उनके,
सोचती हूँ क्या कहूं आयी किसलिये,
फिर अनमनी हो पूछ ही लिया उनसे,
क्या थोड़ी देर अलग से मुझे पढ़ाएंगे?
कैसे कहां से आई इतनी हिम्मत मुझमें,
वो ना जाने क्या सोचते होंगे, बारे मेरे,
ये पूछ इक उलझन सी पाल ली थी मैंने,
बुदबुदाती ख़ुद से कुछ बके जा रही थी मैं,
अंजाम क्या होगा ये सोचती जा रही थी मैं,
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava