बादलों पे पैर रख,
बादलों के ऊपर,
बनायेंगे नये क़िस्से,
जो बादलों के परे,
उड़ा के ले चलें हमें,
वहां से वो सब देखने,
गुज़रे वक़्त को समेटने,
आते वक़्त की धूप को,
सोखने और सेकने,
पारी की दूसरे हिस्से में…
उस पार की दुनिया से,
इस पार की दुनिया के,
अनकहे से कहे हुए,
चमकते हुए क़िस्से,
चहकते से चेहरों,
को सुर्ख़ हैं कर रहे,
अब बस यहां से,
शुरुआत नये से,
थोड़े इसरार से,
ज़रा इन्कार से…
पलों को देखेंगे,
कभी सहमते हुए,
कभी उफ़नते हुए,
कभी भिनकते हुए,
कभी चहकते हुए,
कभी ठिठकते हुए,
कभी महकते हुए,
कभी बरसते हुए,
कभी तरसते हुए,
मुख़्तलिफ़ जज़्बे,
हैं ये सारे के सारे,
बन रहे हैं हमारे,
और बनेंगे हमारे,
किस्सों के हिस्से…
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava
बहुत अच्छीहै। सरल शब्द औरभाव गहरे।