ज़िंदगी की सरजमीं पर...
नंदिनी : ऐसा भी होता है!!! भाग १७
नंदिनी : ऐसा भी होता है!!! भाग १७

नंदिनी : ऐसा भी होता है!!! भाग १७

आदित्य के जाने के बाद वो सोचती रही,
क्या उसका व्यवहार ज़रा ठीक था नहीं,
आख़िर दोस्ती में कोई बुराई तो नहीं,
और है भी आदित्य बड़ा पदाधिकारी,
हालांकि पदाधिकारी होने की चिंता नहीं,
फिर है तो अदित्य शालीन समझदार भी,
उसे क्या मालूम की वो किसी की हो चली,
उधेड़बुन में इसी, याद प्रणय की आ गयी,
नंदिनी यूंही बैठे बैठे ख़ुद से ही शर्मा गयी,
किस बला की होती है ये कैफ़ियत भी,
दिल मान के भी नहीं मानता, चाहत है भी,
बहुत देर तक अन्जानी ख़ुशी से घिरी रही,
तंद्रा टूटी जब दरवाज़े की घण्टी बजी,
देखा उसने जा कर दरवाज़े पे कोई नहीं,
इसी हालत में वो दिन गुज़रा रात गुज़री,
अगले दिन सोचा प्रणय को ख़त लिखेगी,
और आदित्य की पशोपेश उससे कहेगी,
क्या कहेगी कैसे कहेगी क्योंकर कहेगी,
आख़िर दोस्ती ही तो है प्रणय से उसकी,
पर क्या इतनी गहरी है कि ये सब लिखेगी,
परेशान हो उठी और सांस भर सोचने लगी,
ये ख़याल टूट गया याद आया काम कोई,
और उस काम को करने में व्यस्त हो गयी,

नंदिनी के यहां से निकल आदित्य सोचता,
वो क्या सोच के आया था और क्या हुआ,
आते वक़्त लगा था उसे कि वो गले लगेगा,
पर नंदिनी के घर का दृश्य कुछ और ही था,
नंदिनी को उतना क़रीब नहीं महसूस किया,
जितना कि ढाका जाने के पहले दिखा था,
आदित्य था तो समझदार थोड़ा समझ गया,
उसने फिर इस विषय पे ध्यान कम कर दिया,
ढाका जाने के पहले इक दो दफ़े और मिला,
वही दूरी दिखी उसे जिसे वो समझ रहा था,
बिन कुछ कहे कुछ सुने वो वापस चला गया,
ये सोचते हुए कि शायद क़िस्मत में यही था,
उसके बारे में फिर कुछ नंदिनी ने नहीं सुना,
वो ख़ुश थी कि बिन बोले ही वो समझ गया,
हालांकि वो उसे पसंद करती दोस्त की तरह,
जबसे जान गयी ये दोस्ती नहीं कुछ और था,
उसका मन आदित्य की तरफ़ से उखड़ गया,
वैसे भी जब कोई दिल से प्यार में हो मुब्तला,
उस समय कुछ और नहीं सूझता ना दिखता,

जब से आया ख़त, प्रणय का मन नहीं लगता,
वो किसी तरह से नंदिनी के पास जाना चाहता,
जबकि ख़त में ऐसा कुछ भी नहीं था लिखा,
फिर भी दिल को दिल की राह का पता चलता,
ऐसे ही उसने दिल्ली में इक काम निकाल लिया,
सोचा बिना बताए पहुंचेगा तो मज़ा आएगा,
इक हफ़्ते के बाद उसको दिल्ली था जाना,
पूरा समय वह गुनगुनाता और मगन रहता,
उसे क्या मालूम कि नंदिनी भी सोच रही वैसा,
और दादी से मिलने के बहाने मुक्तेश्वर जाना,
अचंभित कर देना प्रणय को पहुंच के वहां,
हफ़्ते बाद नंदिनी बैठी बस में जाने अल्मोड़ा,
उसी रात प्रणय भी जीप में अपनी चल दिया,
प्रणय को चलने से पहले कुछ काम ख़त्म करना,
इसलिए वो देर से दिल्ली जाने को निकला,
चला जा रहा था अपनी धुन में गाड़ी चलाता,
मन मस्तिष्क में नंदिनी की छवि को बैठाता,
जा रहा था गाने सुनता गाता और गुनगुनाता,
बस में बैठ नंदिनी भी उसकी याद में खो गयी,
इधर बस उधर गाड़ी दिल्ली अल्मोड़ा की सवारी,
अभी पहाड़ों से उतरकर हल्द्वानी था पहुँचा,
बस अड्डा देख उसे याद आ गया पूरा किस्सा,
उसी रात की मुलाक़ात के बाद हुआ अहसास,
कि नंदिनी उसके लिए बन गयी कितनी ख़ास,
थोड़ा रूक कर चाय शाय पी कर वो चल दिया,
आधी रात हो चली थी रात का एक बजा था,
आधी दूरी रह गयी थी जब वो रामपुर पहुंचा,
उधर नंदिनी के बस ने भी रामपुर में ही रोका,
थोड़ा आराम कर लेंगे लंबे सफर की रूपरेखा,
नंदिनी बस में ही बैठी सोच रही मुलाक़ात का,
तभी उसकी नज़र पड़ी जीप पर धक हो गया,
वो सोच रही थी मन ही मन ये है कोई सपना,
तभी चाय का गिलास पकड़े प्रणय नज़र आया,
अजीब और बेहद हसीन है ये इत्तेफ़ाक़ कितना,
प्रणय है मानने के लिए इक बार फिर से देखा,
तसल्ली कर उतरी बस से ले के सामान झोला,
और आहिस्ते चल पड़ी जहां प्रणय को देखा,
प्रणय गया था पैसे देने गाड़ी के पास नहीं था,
सामान उसने गाड़ी में रखा दरवाज़ा खुला था,
बिना ये जाने कि प्रणय का क्या कार्यक्रम था,
बस सुनी उसने अपने मन की जो ये कह रहा,
हो ना हो वो उससे मिलने के लिए आतुर होगा,
मन में विश्वास धरे नंदिनी ने गाड़ी में कदम रखा,
चुपचाप बैठी वो ताक रही थी प्रणय का रस्ता,
बस उसकी चली गयी थी अब कोई चारा ना था,
वैसे भी प्रणय को वो जानती थी थोड़ा सा इतना,
सोच रही थी कि अब जो होगा देखा जाएगा,
इतना यकीं था कि प्रणय उसे छोड़ नहीं जाएगा,
नंदिनी गाड़ी में बैठी है इससे प्रणय अनिभिज्ञ था,
इसलिए जब उसने गाड़ी को देखा घबरा गया,
रात के अंधेरे में उसे बस इतना दिखा कोई है बैठा,
नंदिनी बैठी ये वो सपने में भी नहीं सोच सकता था,
घबराया हुआ वो जल्दी से गाड़ी के पास पहुंचा,
ढाबे की मद्धम रोशनी में उसने चांद देखा खिला,
आवाज़ उसकी हलक़ से ना निकली बन गया गूंगा,
जो देखा उसने गाड़ी में वो सपनों के परे सपना था,
अपने में अपने आप से ही प्रणय बुदबुदा रहा था,
उसके होश उड़े हुए थे कुछ समझ नहीं आ रहा था,
ये कैसा सपना है जो अपने सामने देखे जा रहा था,
यकीन से परे यकीन को स्वीकारना चाह रहा था,
कुछ पल ही गुज़रे होंगे कि उसको अहसास हुआ,
यकीन करने की नज़र से वो गाड़ी में जल्द आ गया,
और अपनी उत्तेजना में नंदिनी का हाथ चूम बैठा,
उसे अभी भी यकीन ना था जो कुछ घट रहा था,
नंदिनी के गालों पर इक अश्क़ आ कर थम गया,
कुछ समय के लिए पल ना बढ़ा वहीं जम के रह गया,
दोनों ही भावुक दोनों ही बेचैन वक़्त मिट सा गया,
क़रीब आधे घंटे वे चुप रहे इकदूजे से कुछ ना कहा,
बस इकदूजे को देखते देखते काफ़ी समय गुज़र गया,
जब आया होश दोनों बेहोश, दोनों ना समझे जो हुआ,
इंद्रियों को वश में ला कर बातों का चला सिलसिला,
दोनों हंसते मन ही मन मगन थे क्या कहिये क्या समां,
वहीं बातें करते करते गाड़ी में, सवेरा नज़दीक हो चला,

क्रमशः…

“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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