ज़िंदगी की सरजमीं पर...
नंदिनी : और परिचय!!! भाग २
नंदिनी : और परिचय!!! भाग २

नंदिनी : और परिचय!!! भाग २

समग्र चरित्र निवासिनी,
तन मन से सुंदर नंदिनी,
स्वयं में वो परिपूर्ण थी,
इच्छायें उसकी बढ़ रही,
जवानी उसपर चढ़ रही,
ज़िंदगी से भरपूर वो थी,
मां पिता के बीच संबंधों की,
उसपर गहरी छाप थी पड़ी,
ख़ुद को वो सशक्त दिखाती,
मन के अंदर के डर छुपाती,

डर? किस चीज़ का डर,
अपनो के बिछड़ने का डर,
ख़ुद को समझने का डर,
रिश्तों को संभालने का डर?

इसी डर में नंदिनी पली बढ़ी,
रह गयी बस प्यार की कमी,
वांछित ख़ुद को समझने लगी,
कोई तो सुलझाये ये गुत्थी,
इसी उधेड़बुन में सदा रहती,
समय की घड़ी चलती चली,
आना जाना बेरीनाग चलता रहा,
और साथ रही अनमनी घड़ी,
स्नातक की पढ़ाई पूरी हुई,
आगे की जद्दोजहद शुरू हुई,
व्यापार प्रबंधन की परीक्षा हुई,
अव्वल दर्जे से वो उत्तीर्ण हुई,
पर मन उसका थोड़ा सा उचट गया,
जो करने का सोचा कर पायेगी भला,
उधेड़बुन की धुन में लिया फ़ैसला,
मनोविज्ञान से उच्च स्नातक करने का,
इक नयी ज़िंदगी की शुरुआत हुई,
नज़रियों में उसके बदलाव की घड़ी,

इक ज़िंदगी दूर सुदूर के क़स्बे में,
तक़रीबन उसी समय या थोड़ा पहले,
सांसे लेने लगी थी बनबसा में,
नाम था प्रणय, प्रखर बुद्धि उसमें,
औपचारिक पढ़ाई ना थी पसंद उसे
मन लगता संवेदनाओं को समझने में,
सुशील और मिलनसार व्यवहार,
हर समय मदद करने को तैयार,
सूझबूझ अच्छी पनप रही उसपर,
छोटे बड़ों का ख़ासा ध्यान धरकर,
प्रणय, मनमौजी फ़ितरत से भरपूर,
पिता थे चौवन गांव के ज़मींदार,
अपनी तबियत से थे वो शानदार,
मां की शख़्सियत काफ़ी दमदार,
बेहद पढ़ी लिखी और उच्च विचार,
प्रणय की इक बहन व भाई थे चार,
सभी पढ़े लिखे थे बुद्धि प्रखर,
सादगी उनके जीवन की कमाई,
मां पिता के उच्च विचारों की छाप आई…

क्रमशः…

“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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