प्रणय भी था परिपक्व बड़ा, कुछ नहीं बोला,
उस घनेरे रास्ते में बस उसका मन रहता डोला,
यक़ीन ख़ुद पर नंदिनी की बात सुनकर, आ गया,
बिन बोले ही समझ गया उसके नयनों की भाषा,
साथ में है महबूब और ये कैसी है विडंबना,
नंदिनी के दिल की प्रणय समझना चाहता,
पर मुलाक़ातों का सिलसिला अभी शुरू हुआ,
औरत को समझना मुश्किल भी है और आसां,
उनके मुलायम दिल की जटिल होती परिभाषा,
नाहक कोशिशें करने से कुछ हासिल ना होगा,
साथ साथ चलिए ये है सरल अविरल धारा,
हर नारि को चाहिए पुरुष का साथ बस इतना,
उसके विश्वासों की पूंजी को बस संभाले रखना,
इक मोड़ पर चलती गाड़ी में लगा ज़रा धक्का,
प्रणय की तंद्रा टूटी देख नंदिनी को ख़ुश हुआ,
पर्वतीय मार्गों का हो जैसे सांप सीढ़ी खेलना,
दोनो के दिलों का चल रहा इकदूजे को परखना,
नंदिनी ने कहा जब पहुंचने लगे वो चौरस्ता,
मुझे कोई काम नहीं है, नहीं जाना अल्मोड़ा,
हैरां सा हो गया प्रणय सुन कर नयी बात,
पूछ बैठा नंदिनी से गाड़ी रोक बाएं हाथ,
ग़र नहीं जाना अल्मोड़ा तो कहां है तुमको जाना,
मासूमियत से बोली वो तुमसे मिलने था आना,
इतनी भोली लग रही थी वो कहते हुए ये बात,
प्रणय के दिल को छू गयी उसकी कही ये बात,
पर अभी भी वो सुन्न था उसे नहीं हुआ विश्वास,
कि नंदिनी सरलता से कह देगी मन की बात,
वो जानता था कि उसके बस में नहीं ये कहना,
बेहद मुश्किल है प्यार का सहजता से व्यक्त होना,
ख़ुशी की तरह, प्यार के इज़हार में आता है रोना,
ये वो पल हैं जिसमें सब खोने से सब है पाना,
यहां वहां इधर उधर देखने का दिल ढूंढ़े बहाना,
नंदिनी की दिल की धड़कने हो रहीं थीं तेज़,
सोचने लगी कुछ ज़्यादा कह गयी, हो उत्तेज,
चेतना जागी तो देख रही थी प्रणय का चेहरा,
और पढ़ने की क़ोशिश में पढ़ डाला कितना,
विश्वास तो था ही कि प्रणय है उसका अपना,
हर लड़की की तरह चाहती, प्रणय से सुनना,
वो जितनी है उसकी उससे ज़्यादा वो उसका,
प्रणय ने प्राण का ज़ोर लगाया जो था कहना,
पर ज़ुबां हलक़ तक आते रोकती मन वचना,
अजीब सी परिस्थिति हुई अजीब ही था रंग,
दोनों साथ में भी और दूर दूर एकदूजे के संग,
गाड़ी रुकवा नंदिनी ने कहा थोड़ा आराम कर,
नंदिनी बिंदास क़िस्म की उसी ने की पहल,
बोली प्रणय से गाड़ी से उतरकर थोड़ा टहल,
प्रणय से बोली कि उसका इरादा है अटल,
ग़र नहीं है हिम्मत हां या ना करने की तुममें,
तो मत कहो कुछ भी मुझे नहीं सुनना तुमसे,
हक़्क़ा बक़्क़ा सा रह गया प्रणय लगा सोचने,
क्या कहूं क्या ना कहूं ज़िन्दगी खड़ी है सामने,
पूछ रही है ज़िंदगी क्या नही अपनाएगा उसे,
प्रणय को लगा कि बात निकल रही हाथ से,
इक टक देखता रहा वो बस यूं ही ताकते हुए,
दोनों फिर कुछ नहीं बोले बस चुप रहे आप से,
प्रणय लगा सोचने कहीं कुछ ऐसा ना कह जाए,
बात बनने की जगह और ना बिगड़ती जाए,
चौरस्ता से बढ़ कर वो पहुँचे ही थे खैरना,
चाय की दुकान के पास गाड़ी लगा के रुकना,
ख़ामोशी तैर रही थी उन दोनों के बीच,
नंदिनी ना जाने क्यों पर रही थी खीझ,
हाथ पकड़ना चाहता था प्रणय नंदिनी का,
बड़ी हिम्मत जुटा के छू लिया किसी तरह,
अपनी खीझ में नंदिनी ने हाथ दिया झटका,
प्रणय ने फ़ौरन ही हाथ अपना खींच लिया,
हालांकि नंदिनी को इकदम ही अहसास हुआ,
उसका कतई हाथ छुड़ाने का मक़सद नहीं था,
दरअसल मन ही मन वो देखती थी सपना,
कब प्रणय हाथ बढ़ा कर थामेगा हाथ उसका…
क्रमशः…
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava