चार बजने को आये जब प्रणय ने पूछा,
बाक़ी सब तो ठीक है जा रही थी कहां,
यही सवाल नंदिनी के मन में भी गूंजा,
पर प्रणय के सवाल पे बोली, अल्मोड़ा,
कुछ काम आ गया है घर पर जाना था,
प्रणय के पैरों तले धरातल खिसक गया,
सोचा अच्छा हुआ कि ये इत्तेफ़ाक़ हुआ,
जा रहे थे दिल्ली क्यों रूक गये ये ढाबा,
दिल्ली पहुंच के होती कितनी निराशा,
उत्सुकता वश नंदिनी ने प्रकटी जिज्ञासा,
कहां से आ रहे हो कहां है तुमको जाना,
मुक्तेश्वर जा रहा हूं, हिचकिचा के बोला,
फिर इस संदर्भ में बात नहीं हुई ज़्यादा,
दोनों को ही दिख रहा था अपना फ़ायदा,
ना प्रणय ने बताया, ना ही नंदिनी ने पूछा,
ना नंदिनी ने बताया, ना प्रणय ने ही पूछा,
यह तय करना दोनों को किधर है जाना,
आख़िर अल्मोड़ा चलने का तय हुआ,
कुछ वक़्त वहीं ठहरने का किया इरादा,
गाड़ी बंद कर के दोनों सोए दो घंटा,
छः बजने को हुए जब प्रणय बोला,
चलते हैं सवेरा हुआ जाना है अल्मोड़ा,
गाड़ी चला निकल पड़े ख़रामा ख़रामा,
अभी पहाड़ों का सफ़र बस शुरू हुआ,
प्रणय मन ही मन नंदिनी को देख रहा,
दिल उसका अब क़ाबू में नहीं रह रहा,
मुहब्बत में महफ़ूज़ महसूस है कर रहा,
सदा से है मुहब्बत की ये अनोखी अदा,
सुकूं है भी नहीं भी कुछ पता नहीं चलता,
दोनों बीमार मुहब्बत में दोनों की है दवा,
इकदूजे का साथ ही है इलाज इनका,
इतनी जल्द मिल जाए हल परेशानी का,
फिर काहे की बीमारी और क्योंकर दवा,
नंदिनी प्रणय प्रणय नंदिनी और है क्या,
सारा आलम बेचैन है उनके मिलन का,
हाय क्या करें मुए दिल और ज़ुबां का,
दिल खुलता ज़ुबां है चुप क्या है रास्ता,
इतना मजबूर कोई क्यों हो प्यार में भला,
मुहब्बत की है, कोई गुनाह नहीं है ओढ़ा,
दिल से दिल की राह का रास्ता है ज़ुबां,
ज़ुबां है ख़ामोश मतलब रस्ता नहीं खुला,
दिल, इज़हार में शायद इसीलिए है रोता,
ये ख़ुशी का दर्द वो ख़ुशी ख़ुशी है सहता,
हज़ारों लाखों करोड़ों धड़कते दिलों में,
चमत्कार है दो दिलों की धड़कनों का,
हाय ये दिल उनके लिए ही धड़कता,
बड़ी बड़ी ज़ुबानों में है कहा जा चुका,
फिर भी हर दफ़े इज़हार से है हिचकता,
क्या ख़ूबसूरत है प्यार का ये रिश्ता,
मजबूरी में भी मजबूर नहीं होने देता,
दिल की राह दिल है पहचान जाता,
आख़िर धड़कनों पे किसका बस चला,
हाल ए दिल की देख रहे बनते हुए दास्तां,
नंदिनी के घर में अब हलचल हुई शुरू,
बिना बात किए लड़के की ढुंढाई शुरू,
पिता थे ज़रूर अक्खड़ पर ज़िम्मेदार,
बेटी की शादी की चिंता थी बार बार,
इक दफ़े माता पिता दादा व दादी,
बारे में बातें कर रहे, नंदिनी की शादी,
इक खाता पीता ख़ानदानी लड़का,
उन सब की नज़र में वो आ टिका,
बहुत ही अच्छे घर का लड़का था,
घर में उन चारों को पसंद भी था,
लड़के का नाम आमोद जोशी रखा,
पिता फूलचंद जोशी माँ का नाम विद्या,
इकलौती औलाद वो अपने घर का था,
अच्छी ख़ासी नौकरी भी कर रहा था,
नंदिनी के पिता ने ख़त भेज बुलवाया,
नंदिनी तो थी नहीं ख़त मिल ना पाया,
दादी बहुत प्यार करती नंदिनी से,
उन्होंने सब घर वालों के सामने फ़रमाया,
मुझे लगता है कि नंदिनी की नहीं है इच्छा,
अभी वो तैयार नहीं, मानने को कोई रिश्ता,
ये सब सुन नंदिनी के पिता को ग़ुस्सा आया,
हालांकि,अपनी माँ के सामने कह नहीं पाया,
इनसे अनभिज्ञ नंदिनी जा रही अल्मोड़ा,
ज़िंदगी भी कैसे मोड़ लेती है रोज़ाना,
वो तो मन मगन हो रही प्रणय के साथ,
सोचती बैठी कब मांगेगा उसका हाथ,
क्या लिखा है तक़दीर में किसे है पता,
प्यार की अंगड़ाइयों का अपना ही मज़ा,
नंदिनी प्रबल इच्छाशक्ति की धारित्री,
स्वयं को बनाया उसने इक सशक्त स्त्री,
अपने मन की करती उसको नहीं सुनना,
उसकी आंतरिक शक्ति ही उसका गहना,
अभी काठगोदाम पहुंचे थे नंदिनी ने कहा,
अगर कोई नया रस्ता लोगे तो होगा अच्छा,
वहीं से प्रणय ने गाड़ी मोड़ी रामनगर रस्ता,
जिम कार्बेट होते हुए निकलेंगें चौरस्ता,
बीहड़ वन घनघोर घन मन सुंदर वन,
घिरे हुए घने पेड़ों से ऊपर नीलगगन,
मनोरम दृश्य शांत वन दिल की धड़कन,
रुकती खुलती सोचती ज़ुबां रह गयी बंद,
उत्सुकता जब बढ़ चली बस में नहीं मन,
बोला क्या कह सकता हूं मित्र ए प्रियवर,
नंदिनी ने सर हिलाया हां में फिर किया ना,
बोली कहने से बातों का मतलब होता फ़ना,
कहना ही कुछ क्यों हैं, जब हूं मैं यहां,
क्या ज़रूरी है एहसास को कोई नाम देना?
इस घनघोर जंगल में ग़र हूं तुम्हारे साथ,
क्या ये काफ़ी नहीं, कि चाहिए कोई नाम…
क्रमशः…
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava