बेरीनाग से आया तार, दादी बीमार,
याद तिहारी आ आ के बेचैन बेहाल,
दादी का घर पाषाण युग सा सुंदर,
वहां घूमते लाल मुंह वाले ढेरों बंदर,
दादा दादी का घर बेरीनाग के पास,
इक गांव जिसका नाम बिधूड़ी ख़ास,
पुरानी इमारत पर थी ख़ासी भव्य,
चीड़ देवदार के उसमें बड़े बड़े दरख़्त,
शानदार हवेली रही होगी उरूज़ पर,
नंदिनी का बचपन बीता था वहां पर,
जब कभी माता पिता में होती अनबन,
नंदिनी भाग जाती दादा दादी आंगन,
वो बाग वो बग़ीचे वो दादी का आंचल,
सर पे हाथ फिराते हुए हाथों का स्पर्श,
नंदिनी सारे दुख दर्द भूल जाती थी तब,
सुरक्षित महसूस करती दादा दादी घर,
दादी उसकी भोली करती उससे प्यार,
दादा रह चुके थे गांव के मुखिया सरदार,
वात्सल्य से भरा था दादी का व्यवहार,
ख़ूब जश्न से मनाते सब मिल के त्यौहार,
आम घरों की तरह ही घर का कारोबार,
दीवाली मनाने इकट्ठा होता सारा परिवार,
दादी की चहेती नंदिनी करती ढेरों प्यार,
इसीलिये भेजा गया था दिल्ली उसको तार,
दादी की इच्छा थी नंदिनी को देखे इक बार,
कई महीनों से आंखे तकती उसका इंतजार,
नंदिनी थोड़ा घबरा गयी रही थी तार पा कर
उसको जाना ही था मिलने दादा दादी घर,
अ•रा•ब•अ• से अल्मोड़ा की बस पकड़कर,
सुबह सवेरे पौ फटते ही पहुंची वो अल्मोड़ा,
थोड़ा सुस्ता के उसने घर की तरफ़ मुंह मोड़ा,
जीप चलती पहाड़ों में दुर्गम स्थानों के लिये,
वो भी बैठ गयी इक में, गांव जाने के लिये,
क़रीब क़रीब तीन चार घंटे लगते पहुंचने में,
ख़ासी थकी हुई वो पहुंची दादी के गांव में,
जल्दी जल्दी पग भर वो जा रही दादी घर,
थोड़ी ऊंचाई पर बनी थी हवेली वहां पर,
आकुलता से भरी नंदिनी जब पहुंची घर,
देख हैरान रह गयी वहां की स्थिति मगर,
दादी आंगन में बैठी चिलम रही थी फूंक,
नंदिनी को देख उसकी आंख गयी थी फूंट,
झरझर आंसू बहते उसके, देख नंदिनी को,
नंदिनी भी दौड़ के लगी गले फिर दादी को,
दोनों देर तक बैठे रहे दादी की चारपाई पर,
बोली नंदिनी दादी से, थोड़ी सांस भर कर,
लग तो ठीक रही हो फिर क्यों भेजा तार,
मेरी सांसे रूक गयी थीं मिलते ही समाचार,
दादी ने बढ़ कर फिर से उसे गले लगा लिया,
चूमने लगी नंदिनी को उसपर प्यार आ गया,
बोली दादी मरने से पहले देखना चाहती तुझे,
तार भिजवाने पर आयी वरना कह देती मुझे,
कि व्यस्त हूँ आजकल बहुत आ नहीं सकती,
मेरा क्या बेटी, जान अब खिसकी तब खिसकी,
उदास बातें छोड़ करने लगी वो इधर उधर की,
इसी में काफ़ी समय बीता और रात हो चली,
जब कभी काम से मिलती है फ़ुरसत ऐसी,
लगता क्यों कर रहे काम क्या ज़रूरत इसकी,
देखो कितनी शीतलता है कितना है सुकूं यहां,
क्या ज़िंदगी को सरलता से जीना है कोई सज़ा,
नंदिनी का कमरा ऊपर की मंज़िल पर था,
सोचा जा कर कमरे में थोड़ा सुस्ता ले ज़रा,
रात हो चली थी मद्धम ठंडी हवा बह रही थी,
खिड़की के पास रखे संदूक पर नंदिनी बैठी,
बड़ी देर तक सामने के अंधेरे को तकती रही,
कल्पनाओं से अंधेरो में तस्वीर बुनती रही,
तभी आवाज़ आयी बूढ़ा की, खाना खा ले,
बूढ़ा जिन्हें प्यार से सब बूढ़ी अम्मा थे कहते,
बरसों से उसी घर की सेवा में जीवन बीता,
उनके ऊपर दादा दादी का विश्वास था पूरा,
बहुत प्यार से उन्होंने नंदिनी को खाना परोसा,
सादा सा खाना पराठा सब्ज़ी का था बना,
खाना खा कर सबने साथ में की वहीं गपशप,
थोड़ी देर में दादी बोलीं चलो सोने को अब,
नंदिनी हाथ पैर धो कर फिर बैठी खिड़की पर,
इक दुशाला ओढ़ लिया उसने सर्दी लगने पर,
आंखों आंखों में ही कितना समय गया निकल,
थकी हुई खुली बंद आंखों ने होते देखी सहर,
सारी रात बस इसी ऊहापोह में गयी निकल,
याद आ रहा प्रणय उसे चेतनाओं से निकल,
नंदिनी खड़ी हुई थी ज़िंदगी के दोराहे पर,
इक तरफ़ थी अनिश्चितता बारे में प्रणय,
दूसरी ओर डोर थामने को तैयार आदित्य,
दो एक दिन जब बीत गये उसके दादी घर,
इक दिन सुबह सवेरे तड़के तैयार हो कर,
वो जा रही थी टहलने उस गांव के बाहर,
ताज़ी हवा का आनंद होता है अलग मगर,
सोचने बैठी नदी किनारे इक बड़े पत्थर पर,
मन की उधेड़बुन होती जाती है और गहरी,
ग़र कोई दोस्त ऐसा हो जिससे बात कह ली,
नंदिनी की टोली में कई दोस्त थे उसके मगर,
कोई ऐसा ना था जिससे बातें हो सके हटकर,
दादी उसकी मन की दशा थोड़ा समझ रही,
इसलिये दादी ने नंदिनी से यह बात छेड़ी,
नंदिनी अटपटा गयी थी जब दादी ने पूछा,
ये कैसी उदासी है जिसने तुमको है आ घेरा,
लगता है मुझको कि दिल कहीं लगा लिया,
बताओ मुझको कि क्या है ये सारा माजरा,
रूआंसी हो गई नंदिनी जा बैठी दादी पास,
उसकी गोदी में सर रखकर रोई ज़ार ज़ार,
सुबकते हुए उसने सारी दुविधा थी कह डाली,
दादी ने सर पर हाथ फिरा बस बोला ए पगली,
इस उम्र में इस तरह का होता है असमंजस,
मत हो परेशां ख़ुद ही ना दुखी करो दिल को,
काफ़ी सुकून मिला उसे दादी की बातें सुन के,
दादी की गोद में बैठी नींद आ गयी कब उसे…
क्रमशः
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava
मेरा नंदिनी वाली पूरी श्रृंखला बाकी है पढ़ने को।करता हु जल्दी पूरा।
वैसे आज छठ पूजा है वैसे ही अपने बचपन वाले गांव की याद आ रही थी , दादा दादी वाली कविता ने उस याद को बिल्कुल और भी ताजा कर दिया।