ज़िंदगी की सरजमीं पर...
नंदिनी : मुहब्बत की पेंग!!! भाग १२
नंदिनी : मुहब्बत की पेंग!!! भाग १२

नंदिनी : मुहब्बत की पेंग!!! भाग १२

नंदिनी सोच रही थी अब वापस जाने की,
मन में फ़ितरत थी वहीं समय बिताने की,
अजीब ओ ग़रीब असमंजस की घड़ी थी,
क्या करे क्या ना करे तय नहीं कर पा रही,
फिर यकायक ही मन बना लिया जाने का,
अगले दिन तय हुआ वापस चलने का,
दादा दादी ना चाहते हुए भी रोक नहीं सकते,
जानते थे वो कि नंदिनी के काम बड़े ठप्प पड़े,

उधर काम कर कर के प्रणय गया था थक,
उसका जी लगता अपने परिवार में भरसक,
चार दिन की छुट्टी ले कर वो गया अपने घर,
माता पिता भाई बहन सभी हुए ख़ूब मगन,
प्रणय था सारे भाइयों में छोटा बहन भोली,
भाई बहुत अच्छे से स्थापित बहन अनोखी,
अनोखी पढ़कर टनकपुर में बनी अध्यापक,
उसका हुआ प्रेम विवाह संग सह अध्यापक,
वो भी छुट्टियों में बनबसा आई सबसे मिलने,
संयोगवश पहुंचा प्रणय उसी समय घर अपने,
अनोखी थी हमउम्र उसकी बहन भी दोस्त भी,
प्रणय को लगा अब वो बातें कर सकेगा ढेर सी,
पिता को बुलाता पापा, मा को अम्मा कभी अम्मी,
भाइयों का सादर सम्मान बहन साथ ठिठौली,
हंसता खेलता परिवार था खुशियों की रंगोली,
धूम से मनाते हर त्यौहार दीवाली हो या होली,
प्रणय गया चार दिन के लिये पर रुका और,
साथ समय बिताने का ये मौका है अनमोल,
वक़्त आया वापस चलने का बोला धीरे से,
मां पापा से कहता रहा आइये उससे मिलने,
आख़िर पापा ने तोड़ी चुप्पी और बोल पड़े,
बड़ा मकान ले लो हम आयेंगें तुमसे मिलने,
यह वायदा कर प्रणय चल पड़ा अपने रस्ते,
घर में एक जीप थी प्रणय ले चला उसे,
सोचा था मुक्तेश्वर जायेगा वो पहाड़ी रस्ते,
टनकपुर, पिथौरागढ़ बेरीनाग होते हुए,
अनोखी कह रही थी ग़र जायेगा इसी रस्ते,
मुझको भी छोड़ देना टनकपुर घर मेरे,
दोनों भाई बहन चले अगले ही दिन तड़के,
मां पापा का आशीर्वाद साथ में उनके,
रास्ता था बड़ा मनोरम कहीं दुर्गम खड्डे,
बातचीत करते जाते दोनों ज़िंदगी के चर्चे,
अनोखी ने बताया वो बहुत ख़ुश है मिलके,
उसके पति और उसका ससुराल है हट के,
खुले दिमाग वाला घर सच्चे विचार उनके,
मध्यम वर्ग का सादा जीवन वो सब जीते,
यह जानकर प्रणय को ख़ुशी हुई क्या कहे,
कौन नहीं चाहता कि उसकी बहन ख़ुश रहे,
टनकपुर पहुंच अनोखी के घर वो गये,
सबसे मिल चाय पी प्रणय चला अपने रस्ते,
हौले हौले ख़रामा ख़रामा गाड़ी चलाते हुए,
अनोखी से विदा ले यही कोई दस थे बजे,
रस्ता था लंबा मगर बहुत सुंदर दृश्य थे,
अपनी ही धुन में जा रहा था चलाते हुए,
उसको गाने सत्तर के दशक के लगते अच्छे,
गाड़ी में टेप पर बज रहे थे गाने उसके मन के,
दूधिया रंग में बिरथी का झरना देखा गिरते हुए,
देखते ही मनोरम दृश्य रोमांच से रोंगटे हुए खड़े
गाड़ी रोक कर उतर गया वो अंगड़ाई लेने,
उस झरने से पानी पी कर थोड़ा भरा बोतल में,
दो चार मिनट रुक कर फिर चला रस्ते अपने,
प्रणय अपने मन का बादशाह रोमांच से भरा,
किसी भी स्थिति को वो आंकता हट के ज़रा,
कभी कभी लगता उसको वो जैसे है सोचता,
दुनिया के तरीक़ों से वो नहीं घुलता मिलता,
जैसे कि उसको हैं पसंद उन्मुक्त पहाड़ी रास्ता,
और वहां पहुंच कर वो बस वहीं का होता जाता,
दिल से जितना ख़ुश होता रोमांच से भरता जाता,
सबकी फ़िक्र थी उसको पर अपने मन का राजा,
सब समझते थे कि उसका नहीं कुछ होने वाला,
मतवाला तो था वो और अपनी धुन का पक्का,
उसे नहीं फ़र्क पड़ता ना वो इसपर कान धरता,
क़रीब दो बजे के करीब निकल रहा बिधूड़ी से,
पहाड़ी कस्बों में जीप अड्डा होता मुख्य सड़क पे,
दिल धक से रह गया अचानक पड़ी नज़र उसपे,
नंदिनी खड़ी दिखी किनारे उसको जीप अड्डे पे
विश्वास से परे के वो पल, थामे भावनाएँ कैसे,
ज़ोर से रोकी जीप गाड़ी की निकल गयी चीख़,
देखने लगे सभी उधर ग़ज़ब की थी वो तस्वीर,
नंदिनी की नज़र भी उधर गयी उस आवाज़ से,
जीप में दिखा प्रणय नज़र गयी टकरा उससे,
सोच ही रहा था प्रणय कि मुख़ातिब हो कैसे,
तभी नंदिनी ने इशारे से कहा उसे गाड़ी रोके,
हल्की हल्की बारिश शुरू हो गयी थी खड़े खड़े,
नंदिनी ने बस पूछा इतना कहां जा रहे इधर से,
प्रणय ने पहले तो कहा कि नंदिनी बैठे गाड़ी में,
जिससे कि वो बच सके बारिश में भीगने से,
बैठ कर गाड़ी में नंदिनी ने सांस ली भर के,
प्रणय ने भी गाड़ी आगे ले जा लगाई कोने पे,
सुंदर प्राकृतिक छटा में देखा इकदूजे को उन्होंने,
पल वहीं रुक गये बस सुई की नोंक आगे बढ़े,
क्या कहें क्या ना कहें वो दोनों इकदूजे से,
दोनों ही नहीं चाहते ये पल अभी कहीं खिसके,
फिर बात शुरू की प्रणय ने बोला नंदिनी से,
यहां कहां आ गयी हो तुम कहां थी समय इतने,
नंदिनी की भी अब सांस आ गयी थी बस में,
चुटकी लेते हुए वो बोली आई यहां कुछ काम से,
पशोपेश में पड़ गया वो यहां पर क्या काम उसे,
फिर अनदेखा कर पूछा कहीं जा रही हो इस रस्ते,
नंदिनी फट से बोल पड़ी जीप का इंतजार कर रही,
बस पकड़ूंगी अल्मोड़ा से जाना है मुझको दिल्ली,
आंखे चमकीं बिजली कौंधी लगा सामने है ज़िंदगी,
प्रणय बोला बन कर भोला जाना मुझको अल्मोड़ा,
चाहो तो चलो साथ में मैं तो जा ही रहा हूँ अकेला…

क्रमशः

“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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