परिंदों के आसमां में,
उड़ता इक परिंदा,
इक इक जोड़ता,
तिनका तिनका,
ऊंचे दरख़्त पर,
बना रहा आशियां,
जहां से है दिखता,
आसमां, कहकशां,
और ढेरों तारों का,
झुरमुट बन जाना,
हौले हौले टिमटिमाना…
ऊंचे आशियां से दिखा,
वक़्त गुज़रता हुआ,
वक़्त गुज़रा हुआ,
वक़्त आने वाला,
आसमां में तैर रहा,
माज़ी हर किसी का,
और पल, कल का,
चौंक गया परिंदा,
बाशिंदों पे बाशिंदा,
जाना पहचाना बंदा,
तैर रहे बेजान, ज़िंदा,
उनपर जिस्म नहीं था,
पर हूबहू इंसां जैसा…
परिंदा पड़ा सोचता,
भरम है आंखों का,
या सच है किसी का,
क्या बाक़ी सब मिथ्या,
कुछ कुछ रूह का,
उसे अहसास हुआ,
रूह से घबराते सभी,
परिंदा भी घबरा गया,
वो उड़ने को हुआ,
परों ने साथ ना दिया,
हिम्मत बांध कर उड़ा,
लंबी छलांग लगा,
परिंदा आसमां का,
फिर उड़ चला…
परिंदों के आसमां!!!
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava