ज़िंदगी की सरजमीं पर...
बेल पे चढ़ती छाँव!!!
बेल पे चढ़ती छाँव!!!

बेल पे चढ़ती छाँव!!!

किसी टहनी से बेल पे चढ़ती छांव,
फिर चांदनी ने उजाला बिछाया होगा,

किसी ने ग़ैरत को ललकारा जब,
किसी ने समाज को जगाया होगा,

फिर किसी शौक़ से हुई मुलाक़ात,
फिर ज़िंदगी ने पांव फैलाया होगा,

किसी ने कही होगी दिल की बात,
नादां दिल समझ ही ना पाया होगा,

जब किसी हाथ ने दिया था साथ,
उसी के हाथ दिल भिजवाया होगा,

किसी ने लिखी जो कहानी रेत पर,
लहरों ने आ के और गहराया होगा,

किनारे, खड़े हुए थे पैर जमा के,
हौले से ज़मीं को सरकाया होगा,

किसी ने की इज़हार ए मुहब्बत,
किसी जज़्बे ने होश गंवाया होगा,

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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