उन्हें मग़्फ़िरत की हैं चाहतें,
अदाक़ारी हमसे फ़रमाते हैं,
लफ़्ज़ों को ग़र छोटे में ना देखें,
क्या ख़ूबसूरत बला चाहते हैं,
वो जान गए हम साथ हैं उनके,
ये शिक़वा वो बार बार चाहते हैं,
पाकीज़ा हैं वो ख़यालों में हमारे,
हमको भी वो बेदाग़ चाहते हैं,
तक़रीर ये ग़ैर मुमकिन ही सही,
प्यार में बरख़ुरदार गिरा चाहते हैं,
मुद्दतों बाद मांगें हैं कुछ लम्हें,
मुहब्बत से वो ये सिला चाहते हैं,
दग़ा देने का हुनर है अलहदा,
जाने क्योंकर सीखना चाहते हैं,
कुल्फ़ी बने हुए हैं सर्दी में हम,
और वो फालूदा भी चाहते हैं,
शिक़ायतें तमाम हैं ऊपरवाले से,
वो नहीं जानते वो क्या चाहते हैं,
आज देखेंगे तारीख़ लिखते हुए,
वो मुहब्बत कुबूल किया चाहते हैं,
वफ़ापरस्ती में इक मुक़ाम जुड़ गया,
टूटे धागों को अब जोड़ना चाहते हैं,
मग्फ़िरत = (माफ़ी)
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava
Shaandaar,…. Jabardast…. It took me three attempts to read and understand, but must say one of greatest one!
बहुत खूब