यूंभी है कि ज़िंदगी गुलज़ार है,
और ये भी कि रुकावटें दो चार हैं,
कभी लगे है कि ज़िंदगी दुश्वार है,
कभी लगे है दरिया, जाना उस पार है,
दिल दरिया में दिल ही लाचार है,
पता है कुछ समय से कुछ बीमार है,
वो कहते हैं उन्हें नहीं आराम है,
दिखता है किस क़दर ख़ुद से परेशान हैं,
छोटी सी दुनिया बसायी है हमने,
वो कहते हैं कि उन्हें नहीं स्वीकार है,
जो ना सोचा था हो जाए शायद वो,
इस बवंडर के अच्छे नहीं आसार हैं,
चमन बिखरता दिखता है सामने,
अब के लगता है तूफान बदहाल है,
कुछ क़दम साथ चलें कुछ बातें करें,
बरसों के साथ का इतना तो आधार है,
इक दफ़ा ये कहते सुना था उनको,
बस इक फांस है जो उनको नागवांर है,
तुम कहो तो कहो, हमने कह ली है,
हां ये जान लो हमें अब भी ख़याल है,
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava
कभी कभी यूँ भी होता है कोई लिखता है और कोई पढ़ता है ।। खुद में यह हुनर नहीं पर जिसमे है उसकी तारीफ करता है ।। वाह वाह ! वाह वाह !! बहुत खूब