ज़िंदगी की सरजमीं पर...
वजूद!!!
वजूद!!!

वजूद!!!

कल शाम, कल रात से बात हुई,
सोचती रही रात मगर नहीं सोयी,
वक़्त था तक़रीबन रात के ढाई,
अल्लाह दुहाई अल्लाह दुहाई,
नींद आ कर भी नहीं आई,
सख़्त तख़्त पर ले के रजाई,
ठंड से कुड़कती थी अंगड़ाई,
ख्यालों ने यक़ायक़ बिजली कौंधाई,
हमारा वजूद और हम, कौन हैं भाई?

हमारा वजूद हमसे अलहदा है क्या?
ग़र है ऐसा तो क्या ही कहना,
ग़र नहीं है ऐसा तो वजूद हमारा,
हमारे अंदर सांसे हैं भर रहा,
हमारी सोच से सिंचित हो रहा,
हमारे तजुर्बों से वाक़िफ़ हो रहा,
हमारे माथे की झुर्रियों में सैकड़ों,
तजुर्बे हर पल हैं पल रहे, बढ़ रहे,
उन्हें संभालना भी है सहेजना भी,
बहुत नाज़ुक होते हैं ये तजुर्बे,
आंख बंद कभी खुली आंखों से,
झांकते हैं वजूद को कुछ ऐसे,
ज्यूं आसमान ताकता फ़क़ीर कोई,
और दुआ करता है परवरदिगार से,
के बारिश कर यहां पर तौफ़ीक़ की,
तजुर्बे शायद नहीं समझते अच्छा बुरा,
उन्हें समझाया जाता है, दिमाग़ से,
उसका असर पड़ता ही है वजूद पे,
याद है ना, सांसें भर रहा है वो भीतर,
और उमड़ रहा है बवंडर अंदर ही अंदर,
उड़ा ले जाता है वो साथ वजूद को,
और देखता रह जाता इंसान चुप खड़ा!
पूरा का पूरा वजूद हवा हो चला!!!

पौ फटने को थी आंख लगने को आई,
रात, कल सारी ही रात नहीं सो पाई,
उसे अब नींद बेहोशी सी है आई,
राम राम है भाई…अल्लाह दुहाई,
सब कहते रहे कानों में उसके,
जूं तक ना रेंगी आवाज़ें भनभनाईं,
कल रात वजूद जो हवा हो गया,
वो सोया अब, चैन की नींद आई!!!

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *