ज़िंदगी की सरजमीं पर...
सिमटी हुई!!!
सिमटी हुई!!!

सिमटी हुई!!!

वो सिमट जाना चाहती थी, उस वक़्त के क़रीब जाना चाहती थी, जहां उसने देखा था खुला आसमां और बैठी थी वो इक दरख़्त तले ज़मीं से निकली दरख़्त की जड़ों के ऊपर। वो उस दरख़्त की आग़ोश में हो जाना चाहती थी …गुम हो जाना चाहती थी …इक डाली लोच से भरी उसे यूं तंग कर रही थी मानो उसे भोर में जगा रही हो…लोच से भरी शाख़ उसके नरम बालों को सहला रही थी यूं के इक जुंबिश सी तैर रही थी उसके गालों पर…वो ख़ुद से पत्तों की नरमाहट को महसूस करना चाहती थी…शायद मुहब्बत कर बैठी थी वो…किससे? कौन जाने! उसके चेहरे का सुकूं देखते ही लगता था कि वो यक़ीनन ही है मुहब्बत में वरना कोई इतनी तसल्ली में नहीं दिखता।

तभी इक ज़ोर का धक्का लगा उसे जैसे किसी ने झाँक लिया उसके चित्त में और फिर यक़ायक़ ही वो उठ बैठा घबरा कर…मुस्कुराता रहा बहुत देर तलक वो अपने सपने की महक़ पर जिसने उसे इतनी गहरी नींद दी थी…कहता है वो अक़्सर ही, कि उसके सपने उसे छलांग देते हैं अपनी चाहतों को पाने के लिये…वैसे भी कहावत है ना कि चाहत पर नहीं किसी का ज़ोर। वो कहता है कि किसी भी एहसास को महसूस करने के लिये सुलझी हुई सरल सोच का होना ज़रूरी है, वरना वो एहसास महसूस होने के क़रीब से निकल जाता है जिसका आभास भी नहीं होता। वो कहता है अक़्सर कि वो इल्ज़ाम-ए-इश्क़ ही क्या जो असल ना लगे और वो आशिक़ ही क्या जो इसे सर ना धरे।

सिमटना! क्या ख़ूबसूरत एहसास होता है, बहुत मुत्तासिर है वो इस लफ़्ज़ से…कहता है कि इस लफ़्ज़ में इक सारगर्भिता है जो मौक़ा देती है फैलाव को सिमट कर संक्षेप में उजागर होने का…सिमटना यानि क़तरे में बयां होना! ख़्वाब हो या असल बयां होना लाज़मी है, फिर वो लफ़्ज़ों में हो, इशारों में हो, सलाहियत से हो या चढ़ी हुई त्यौरियों से हो…सब का सब दिखता है चेहरे पर सब कुछ बयां कर देता है ये। सिमट के काग़जों पर उतरे हर्फ़ों को यूं जड़ दिये हैं दिलों में कि, हर इक हर्फ़ इक नगीना लगे, किसी में चमकते हैं मोती तो कोई चमकता है हीरे जैसा, किसी हर्फ़ में जड़ा है नीलम; के कब नसीब बदल कर रख दे, तो किसी में मूंगा जो उस हर्फ़ को ही नया आयाम दे…सिमटने में इक सादगी भी है जो फैलाव को संतुलित करती रहती है, कुछ यूं जैसे माली पेड़ों की शाख़ों को काटता छाँटता रहता है जिससे उस दरख़्त का आकार बना रहे।

सिमटना तो ज़िंदगी का सार है जो फैलाव को लगाम लगा देता है वरना ज़िंदगी हाथ पैर छोड़ कर बढ़ती ही जाये। आकारों को आख़िर सिमटना ही पड़ता है वो कहकशाँ के तारे सितारे हों, ग्रह नक्षत्र हों या हों कहीं भी किसी भी रूप में पनपती ज़िंदगी। सिमटने का सिलसिला फैलाव की नियति है। इंतेहा तलक टूटने को, सिमटना कहता है वो, और जो इंतेहा तक जा सका है वो है बस इश्क़, ना उसके आगे है कुछ ना ही है पीछे…बहुत सी मुलाक़ातों में सुना है उससे कि जो इश्क़ ना कर पाये ख़ुद से वो समझ ही ना पाया कि ये बला क्या है और क्यों ही कम लोग समझ पाये हैं इसे, और जीना इश्क़ को तो अलग ही इंतेहा है…मुहब्बत लबरेज़ है इस ख़याल से कि इस धरती का हर इक क़तरा है इश्क़ से सराबोर, बस आंखों के बस में नहीं ये, उसे तो बस महसूस ही किया जा सकता है…क़तरों को देखना मुश्क़िल ही सही पर नूर बसता है क़तरों में ही और इश्क़ बहता मिलता है उनमें।

यह सिलसिला चलता आ रहा है और यूंही चलता रहेगा लगातार,बारबार, हर बार, हर दरबार, हर इक द्वार, करोड़ों हज़ारों बार…हक्क़ा बक्क़ा तो मैं तब हुआ जब संदूक से निकाल कर ये तराशे हुए एहसास घोंघे ने क़रीने से फैला दिये मेरे चारों तरफ़ और मैं उसे देखता रहा दूर तलक जाते हुए जबतक कि वो ओझल ना हुआ मेरी नज़रों से…मैं ये सोचता बैठा रहा वहीं पर घंटों तक कि जाने कैसे ये एहसास जगे होंगे घोंघे में…फिर मैंने आसमाँ देखा और सोचा कि उसके करम शायद यहीं से बरसते होंगे…

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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