टूटे अहसासों से पीछा छूटता नहीं,
बरगद तले भी पनपा है कुछ कहीं,
दरख़्त पे यूं, तिलिस्म लटके है कई,
ज्यूं इक बदन ढो रहा, लिबास कई,
कितने क़िरदार पहने इस जिस्म ने,
गोया, इक भी मन के मुताबिक़ नहीं,
अब जबके लगा के किनारा है पास,
साहिल खिसक के दूर खो गया कहीं,
जिस्म औ रूह की मुलाक़ातें बेचैन,
इक ने कहा रुक, दूजा वहां था नहीं,
साफ़गोई की दुहाई परोसते परोसते,
भूल गये आसमां पे काले धब्बे हैं कई,
अख़लाक़ ढकते ढकते उम्र गुज़र गई,
पैराहन से कभी क़िरदार छुपे हैं कहीं,
यक़ीनन उस तरफ़, ज़मी होगी हरी,
सुर्ख करने में इधर, रखी कहां कमी,
टोकी गयी, जब जब चलने को हुई,
हिदायतें मिली इतनी, ज़िंदगी थक गई,
नसें, यक़ायक ताज़ी सासें भरने लगी,
सोच, क़ैद से अब जा कर आज़ाद हुई,
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava