ख़यालों की ग़ुलामी से हों आज़ाद,
हो रही हो बुलंद हमारी आवाज़,
अंदर धधकती सी हो हमारे आग,
जिस वजह से सोते से जायें जाग,
तो हम असल मायनों में है आज़ाद,
नौकरी कर रहें हो या हो व्यापार,
किसी भी क़िस्म का ना हो उधार,
चित्त हो जगा हुआ तो है बेड़ा पार,
काम करें वही जिसमें मन एतबार,
तो हम असल मायनों में है आज़ाद,
नहीं मुक़म्मल जिन्हें जीवन सौग़ात,
रखें कलेजा के थाम सकें वो हाथ,
और बिन जताये उनका दें हम साथ,
सशक़्त सक्षम महसूस करें दिनरात,
तो हम असल मायनों में है आज़ाद,
दिल से ना हों हम कभी ग़ुलाम,
हो ये ख़याल के हम ही हैं अवाम,
ख़ुद्दारी ख़ुदमुख़्तारी से करें काम,
डर के नहीं इज़्ज़त को करें सलाम,
तो हम असल मायनों में है आज़ाद,
बरक़रार आज़ादी तो हम हैं स्वतंत्र,
इसके लिये करें क़ोशिश हर वक़्त,
ना हो यक़ीं तो पढ़ें अपना इतिहास,
फ़ख़्र से कहते बाशिंदे हम आज़ाद,
तो हम असल मायनों में है आज़ाद,
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava
Kya baat hai sirji
“ Vande Mataram”