ज़िंदगी की सरजमीं पर...
मैं घर ढूँढता हूँ…

मैं घर ढूँढता हूँ…

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

मकाँ नहीं, अपना घर ढूँढता हूँ,
इन ईंटों में जज़्बातों को ढूँढता हूँ,

ख़ासा सजा के रख्खा है हमने आशियाँ,
और ज़िंदगी को इस इमारत में ढूँढता हूँ,

इन्तेहा जी रहा हूँ अनहद सा सोचता हूँ,
और मौसिक़ी को धागों में पिरोना चाहता हूँ ?

बड़ा परेशाँ सा घूमता हूँ, पशेमाँ हो रहा हूँ,
उसकी बनायी क़ायनात में इँसान ढूँढता हूँ,

ख़ासा दर्द है मेरी नसों में बहा देना चाहता हूँ,
समन्दर अपने अंदर का निकालना चाहता हूँ,

अंदुरुनी हलचल मुझे जीने नहीं दे रही है,
अलग बात है कि मैं सुकूँ में नज़र आ रहा हूँ,

दुनियां में रहने के सबके अपने अपने उसूल हैं,
इतनी भी तिलमिलाहट क्या, ग़र मैं बना रहा हूँ,

यूँही सबने मिल के ज़िम्मेदार क़रार कर दिया,
क्या कहूँ कि अल्हड़पन अभी जी लेना चाहता हूँ,

दिल कहता है चीख़ के कह दूँ उस रब से,
हवायें गरम ही सही, महसूस करना चाहता हूँ,

मेरी नज़र से देखिये,  हाँ मैं साफ दिख रहा हूँ,
मुझे परछाईंयों में ना ढूंढिये, उनसे बड़ा हो गया हूँ…

“मनु शरद”

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