Copyright © by Manish Kumar Srivastava
बार बार हरबार,
वो कहते जाते हैं,
हम सुनते जाते हैं,
फिर हम कहते हैं,
वो सुनते जाते हैं,
चर्चाओं की हमारी लंबी है क़तार…
क़ौमी समझौतों की बातेँ,
उसकी जड़ता की बातेँ,
बदली सोचों की बातें,
परस्पर कटुता की बातें,
फिर एकजुटता की बातेँ,
बातों ही बातों का है अम्बार…
मिट्टी की सौंधी सुगन्ध,
सबको आती इक सी गंध,
एक जैसा फ़सलों का रँग,
नहीँ बदलता कोई हो सँग,
लहरातीं हैं जैसे हो मलंग,
फ़सलों का नहीं कोई दरबार…
कबतक यूँही लड़ते बैठेंगें,
क़ोशिश कर हम ना ऐठेंगें,
तुमसे यही गुज़ारिश करेंगें,
वो दिन अब कल ही लायेंगें,
हमसब साथ फिर मिल बैठेंगें,
हमारा बस एक परवरदिगार…
मिल के हम सब हिंदुस्तान,
यही हमारा घर यही जान,
गँगा जमुनी की पहचान,
कहीं भाई कहीं भाईजान,
आरती, अरदास, अज़ान,
भारत बने विश्व का सरमायेदार…
चाहे भारत के हों हिन्दू,
हिन्दुतान के मुसलमान,
हम रहते आये साथ में,
सदियों की है पहचान,
हिंदुस्तान में बसा भारत,
भारत में बसा हिंदुस्तान,
देशहित की सोचें सदा, करें देश से प्यार…
“मनु शरद”
भई यह तो कमाल की है। कौमी यकजहती और राष्ट्र प्रेम का अनूठा संगम।
बहुत सुंदर
इस प्रतिभा का तो अभी ही पता चला आपकी