आज इक सफ़र की
बात करता हूं,
तुमसे जो पाया
उसे बयां करता हूं,
पायी है ज़ुबां,
ज़ुबां खोलने की अदा,
तलफ़्फ़ुस में इज़ाफ़ा,
अदब का लिफ़ाफ़ा,
और जाने क्या क्या,
और ये भी कि सच,
कड़ुवा ही सही,
कहा जा सकता है,
मीठी ज़ुबां…
मेरा कहकशां,
मेरा आसमां,
तुम्हारे होने से,
टिमटिमाने लगा…
वो इक निगाह,
जिसने दी ये नज़र,
क़दम तो बढ़ा,
कुछ तो कर,
बाबत इस सफ़र,
ना डिग ना डर,
चल तो सही,
अन्जानी डगर…
मनुशरद का नमन…
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava