इक ज़माने का ज़िक्र छिड़ा,
यादों का कारवां चल पड़ा,
बीते लम्हों के यादगार पल,
ढेरों हैं, ढेरों का सुरूर छाया,
कुछ बड़े कुछ हैं छोटे किस्से,
हां सही हैं कि मज़े के किस्से,
सुनिये सुनाते हैं ख़ुद ये किस्से,
बयां होते हैं आप ही ये किस्से,
बयां हो जब, तो हों सुनने वाले,
हो सुनने वाले तो छिड़ेगें किस्से,
वक़्त के साथ और वक़्त के परे,
सुन के आप बनना चाहेंगे हिस्से,
क़िस्सा : पहला
तीन लाख की जनसंख्या वाले,
अंदमान के लोग थे ख़ासे निराले,
हिंदुस्तान को मेनलैंड थे बुलाते,
अंग्रेजों के बाद आज़ादी चख़ रहे,
और हिंदुस्तान क्या है समझ रहे,
अंदमान की अपनी महक फैलाते,
थोड़ी जनसंख्या को उस ज़माने में,
द्वीप समूह के प्रशासन चलाने वाले,
कुछ ही अफ़सर होते संभालने वाले,
आमतौर पर वे दिल्ली से भेजे जाते,
दो साल के लिये अंदमान वे भी गये,
कुल जमा चार पांच अफ़सर आला थे,
उनमे से वो भी इक आला अफ़सर थे,
वो साहब नवाचार के तहत आमतौर पे,
अर्दलियों से सीधे बात नहीं करते थे,
इक दिन जब साहब दफ़्तर जाने लगे,
अर्दली ने बड़ी विनम्रता से पूछा उनसे,
साहब दोपहर के खाने में क्या खायेंगें,
नवाचार के तहत बोले, खाना खायेंगे,
जनाब दफ़्तर से लौट के घर जब पहुंचे,
खाने की मेज़ पर दो मर्तबान रखे हुए थे,
खोल के देखा, इक में केवल चावल थे,
दूसरे मर्तबान में नारियल रखे थे,
साहब का ग़ुस्सा सातवें आसमान पे,
ज़ोर से पूछा ये क्या बनाया है खाने में,
अर्दली डर के बोला खाना बनाया है,
काटो तो ख़ून नहीं थे हाल साहब के,
तबतक उनका राइडर बोला आहिस्ते,
यहां मतलब “खाने” का केवल चावल है…
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava