निकल चुकी बात अब हाथ से इंसानों के,
ज़हरीली सांस पी रहे हैं अपने मकानों में,
आंख मिचिया देता है धुआं सर्द रातों में,
ज़हर नशीला फैला है, बहती हवाओं में,
सांझ भी आ जाती है जल्द, घर को जाने,
अंधेरे मुंह जो पहुंची तो जाने कौन पहचाने,
गलियां ही ठीक थी, रस्ते जबसे बड़े हुए,
कुछ रिश्तों में दूरी और कुछ चल ना सके,
दम तोड़ता माहौल है अब, क्या कहिये,
दो पल सांस भरने को, सांस लेने दीजिये,
दरख़्त गये थक, हवाओं को साफ़ करते,
भारी सी फ़िज़ाओं में कोई कैसे रहे हल्क़े,
लगते हैं हांफ़ने खुली हवा में सांस भर के,
हवाएं भी शर्मिंदा हैं, मगर वो भी क्या करें,
शहर का हाल बेहाल, गांव भी नहीं बच सके,
जंगल का सहारा था, वो भी दिखे सांस भरते,
लगता है क़ायनात में जाकर भरेंगे सांसें,
ज़मीं पे फ़ुरसत ही किसे कि इसमें झांके,
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava
Aati uttam
बहुत सुंदर