गहराए आसमां से झांकता धूप का टुकड़ा,
चमकते समंदर पे तैर रहा, बन के धब्बा,
लगे के यूं जैसे ज़मीं से अंधेरा रहा हो मिटा,
अचानक उस धब्बे पे बारिश ने फेंका छींटा,
धूप के धब्बे ने इतराते हुए कुछ यूं देखा,
जानता है, सब जानते हैं, के वक़त है क्या,
तेज़ हो रही बारिश दिखता ना था रास्ता,
धुंधला गयी थी ज़मीं फट पड़ा था आसमां,
ज़मीं के कोने पे जहां ख़त्म हो रहा था जहाँ,
मन अंदर इक बवंडर, बाहर तूफ़ां उमड़ रहा,
देख रहे थे इक क़श्ती डूबते हुए थोड़ी दूर पर,
जहां पे डूबी क़श्ती साहिल वहीं पे बिछा हुआ,
मन का हो या छल का हो पर चाहिये किनारा,
मन छलता मन को, कभी मन ही छला जाता,
किनारे खड़ा सोचता रहा कोई कमी है क्या,
साहिल भी है पास मेरे और समंदर भरा हुआ,
लहरों पे उड़ के बैठते परिंदों के देख सोचता,
शाम होते होते हर इक परिंदा घर चला जाता,
समंदर मुस्कुराया तो झिलमिलाने लगता,
जिधर नज़र डालिये, हर नज़ारा है दिलरुबा,
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava
“Gahraya Aasman’ How beautifully connected with Nature’s one activity to other…. moreover metaphorized with human life as well.