पानी के पास ये इख़्तियार नहीं,
वो रोक सके ख़ुद को ढुलकने से,
और आब ख़ुदमुख़्तार भी नहीं,
कि बे मौसम ख़ुद ही बरस सके,
है ख़ुद मुख़्तारी आब में तभी,
के आंसू बन रुख़ से ढल सके,
आग भी लग सकती नहीं यूँही,
उसे भी जलने की चाहिये वजह,
दिल की आग सब ख़त्म करती,
वरना गरमी से तो दिये हैं जलते,
हवा है मन, है पर दिखती नहीं,
दिखे नहीं पर सांस उसी से चले,
देखना है ग़र कि हवा है क्या,
उड़ान उसकी, क़तरों पे है दिखे,
पाये हैं बहुत आसमां ज़िंदगी में,
है ये वो छत जिसे कोई छू ना सके,
आसमां सभी का है, ये सच है,
आफ़ताब को वो संभालता दिखे,
है धरती इन सभी को समेटे हुए,
हर रोज़ दिखे हैं नये नये क़रिश्मे,
इस धरती को ख़त्म करने की,
आदमी रोज़ साज़िश रचा करे,
आब आग हवा धरती आसमां,
क्या बिगाड़ा है इंसाँ का इन्होंने,
क्यों लगे हैं चंद इंसान इसे उजाड़ने,
चमन इंसान के सिवा भी है हज़ारों के,
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava
पंचतत्व…… चमन है औरों के भी फिर हमीं क्यू…..
बहुत खूब .