ज़िंदगी की सरजमीं पर...
बचपने!!!
बचपने!!!

बचपने!!!

कुछ ख़याल छुटपन के,
ज़हन में तैरते हैं ऐसे,
के वो ख़याल नहीं हैं,
गुज़रते पल हैं देखे,
सच में बैठे हों पास जैसे,

मिट्टी गूंध कर हाथों से,
सौंधी सी सुगंध साथ,
थाम कर दोनों हाथ,
अरुणिम प्रभात में,
सर से पांव सने मिट्टी में,

खींच के लकीरें कागज़ पे,
सूरज ऊपर बिठा दिया,
इक दरिया बहा दिया,
पर्बतों को जिला लिया,
और भर गये नज़ारे रंगों से,

लग जाते झांकी सजाने में,
कई रंगों में रंग कर बुरादा,
बनाते मकां औ बरामदा,
आंगन में पेड़ की छाया,
गाड़ी माचिस के डिब्बों से,

वो सामने के घर में,
उसका आना,
ख़तम हुआ वीराना,
दिल हुआ दीवाना,
ख़ुद ही ये बता ना पाते,

पीपल की छांव तले,
गर्मी की रातों में,
सोना छत पर आ के,
हौले हौले हाथ फिराना,
मुलायम चादर की ठंड पे,

आंखों में बस गये हैं सारे,
पेड़ पे करौंदे हरे हरे,
कांटों की छांव तले,
सूरज से बच के बैठे,
कैसे थे नायाब बचपने,

कहते हैं, लौट के आते,
उम्र के उत्तरार्ध में,
वो छोटे से बचपने,
बच्चों के बच्चों में,
नातिन नाती पोती पोतों में…

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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