वो तो ईश का युग था,
वो तो ईश का सुत था,
बोझ दससीस का उठा,
वो थक था बहुत गया,
इक इक कर शीश कटा,
उसे मिलता आशीष गया,
दस शीश की बता व्यथा,
उसने मस्तक झुका दिया,
उसको हुआ अहसास बड़ा,
के हाथ उसके कुछ ना पड़ा,
दस के दस में बस ज्ञान भरा,
उनमें नहीं था रस भी ज़रा,
बिन रस ये जीवन है मिथ्या,
चिंतन में वो बहुत समय रहा,
दस सीसों का वो क्या करता,
उसको नहीं कोई हल मिला,
अंततः प्रभु की शरण चला,
सोचा, हो उसका अंत भला,
अगर वो प्रभु के हाथ मरा,
जान ना पाया, कैसे तरेगा,
ज्ञान ने उसको मूर्ख बनाया,
जब ना कोई कारण पा पाया,
प्रभु आत्मा छल से चुरा लाया,
लालच लोभ की लोलुप माया,
कौन है, जो इससे बच पाया,
रस व रसायन में भेद है क्या,
रस ज़्यादा हो, रसायन बनता,
और बुद्धि को कुबुद्धि करता,
वो तो ज्ञान का था देवता,
ज्ञान से वो ब्रह्मांड था जीता,
उसके अंदर अहम था बैठा,
ये जड़ता उसका विनाश था,
वो बंदा बड़ा विकराल था,
ये सबकुछ वो था जानता,
जाना बूझा था सब उसका,
पर अहम के आगे ना सूझता,
बनना चाहता देवों का देवता,
इक तरफ़ दम्भ था उसका,
उसको लालच था इक दूजा,
वो चाहता अलग प्रभु पूजा,
संसार में नहीं भक्त उस जैसा,
उसका अहम उसे लग गया,
और वो दसानन बन गया,
इक ओर थी उसकी लालसा,
दूजे करे वो इसकी मीमांसा,
ये द्वेष मस्तिष्क में है पलता,
और किसी छोर ना रहने देता,
दसानन को ईश ने नहीं मारा,
वो अपने अहंकार से हारा,
मेल जो ना हो बुद्धि व संवेदना,
वो हर लेती है सारी ही विवेचना,
अनिवार्य है जीवन रस का होना,
इसके बिना, ना चांदी ना सोना,
कौतूहल मन के त्यौहारों का,
ज्ञान में संवेदना मिलाने का,
दससीस अवश्य ही रखने का,
पर इसे ना व्यर्थ ख़र्च करने का,
नव रस हो जो दससीस में ज़रा,
जीवन जीने का आ जाये मज़ा,
ना मांग कुछ भी ईश से ऐसा,
क्योंकि मिल जायेगा जो मांगा,
बिन सोचे जो मांगा, मिल गया
फिर जीवन भर उसे भुगतेगा,
किसी से भी ना कह पायेगा,
अपने ही जाल में फंस जायेगा,
ऐसे दसाननों से, ये संसार भरा,
सोच विचार कर मांगना ज़रा,
दसानन के पास था ज्ञान भरा,
उसको चाहिये था मोक्ष सदा,
मोक्ष? ये मोक्ष होता है क्या?
मुक्ति मिले, छूट जाये वासना,
सिंहासन पे बैठने की वासना,
सदा “हाँ” सुनने की वासना,
उपासना में बैठी हुई वासना,
और मन से मन की भर्त्सना,
दसानन को भलीभांति ज्ञात था,
वासनाओं में उसका वास था,
जगाना चाहता था वो चेतना,
अनैतिक उसने ये कार्य चुना,
और ईश से करता वो प्रार्थना,
दस सीस का भार मुझसे उठा,
हे ईश, मुझको दे इंसान बना…
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava
Aati uttam