इक दौर वो और इक दौर ये है,
इक ठौर वो और इक ठौर ये है,
उधर भी मौज इधर भी मौज है,
इक ओर साज़ इक ओर सोज़ है,
इक ठौर कठोर इक ठौर तरल है,
इक ठौर सहज इक ठौर सरल है,
इक छोर पे डोर दूजे छोर गांठ है,
इक छोर पे मोर दूजे पर सांप है,
इक छोर संताप का पश्चयाताप है,
इक ओर लेखा जोखा पुण्य पाप है,
इक ओर स्वयं की पीर भी पराई है,
इक छोर, ना जाने कौन, हरजाई है,
इक ओर मात्र असत्य पे निर्वाह है,
इक ओर सत्य समझने की चाह है,
उस दौर में इस दौर की तरह दौड़ नहीं,
इक दौर वो था और इक दौर ये सही…
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava
Bahoot Badiya !!!
Wah wah !!
बहुत खूब ।