वक़्त, आदमी की इजाद है,
बाक़ी सब इससे आज़ाद हैं,
दिमाग़ी क़ैद में, वक़्त सोचता,
बग़ावत तो करनी ज़ोरदार है,
यूं इंक़लाब कर रहा है, वक़्त
जैसे वक़्त कम उसके पास है,
जबसे दरख़्तों ने सुनी ये बात,
वो गुलों का करते इंतिख़ाब हैं,
वक़्त कुछ यूं इंतेज़ार कर रहा,
ज्यूं रिहाई ही उसका ख़्वाब है,
चमकते सितारों को इल्म कहां,
के उन्हें भी वक़्त की दरकार है,
आदमी, कहकशां में समझदार है,
चूंकि वक़्त ही है जो उसके पास है,
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava