ज़िंदगी की सरजमीं पर...
सफ़र ए लद्दाख!!!
सफ़र ए लद्दाख!!!

सफ़र ए लद्दाख!!!

दूर से आती आवाज़ के जब पास आ गये,
बारिश के नदी में उतरने से सैलाब आ गये,

ख़ामोश थे लब औ थरथराहट थी सांसों में,
हलचल भरी घबराहट थी, हम कहां आ गये,

ज़मीं खिसकने का ख़ौफ़ था क़ाफ़ी ज़्यादा,
ऊंचे बहुत ऊंचे परबतों के दरमियां आ गये,

उतरता नहीं वो रोमांच, वो गु़र्राना आब का,
क़रीब थे ख़तरे ये जान के, हम दूर आ गये,

सासें चल रही भारी, बाहर हवा थी हल्क़ी,
रूमाल में बांध सांसें, जिस्म में रूह लाते गये,

ऊंचे दर्रों को पार कर वादियों का खुलना,
बर्फ़ की चट्टाने, गुल ओ आबशार आ गये,

कहते हैं उस पार की दुनिया के क्या कहने,
दर्रों को पार कर उस पार जन्नत में आ गये,

नज़ारों की यहां पर जैसे महफ़िल है उमड़ी,
हज़ारों रंग आंखों के कैनवास पर छा गये,

परबतों से ऊंची झील पे आसमां गहरा गया,
नील के मुख़्तलिफ़ रंग तैरते पानी पे छा गये,

बर्फ़ को लग रही ठंड वो गहरी सांसें ले रही,
उधर वादी में हवा के झोंके तेज़ी से आ गये,

परिंदों की उड़ान से दूर दर्रे क़ाफ़ी क़रीब लगे,
जाते जाते रस्ते दूर और ख़ूबसूरती से छा गये,

ठंडी दरिया के किनारे रेत के मैदान हैं बिखरे,
सैलाब से पत्थर रेत बन कर चमचमा गये,

दर्रों चोटियों का आलम बरगरीज़ सा दिखे,
पिघलती बर्फ़ से वादियों में सैलानी आ गये,

नायाब हिम भेड़ें, जंगली खच्चर हिम तेंदुए,
ये पहाड़ मैदान उनके,हम यहां कहां आ गये,

सड़क मीलों फैली सीधी सीधी चलती रही,
झीनी हवा, मद्दम सांसें, ऊंचे बुगियाल आ गये,

कहीं मीठा सा डर लगे, ज़्यादा लगे रोमांचक,
मनुशरद को लगने लगा, के हम स्वर्ग आ गये,

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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