ज़िंदगी की सरजमीं पर...
हेमंत का आग़ाज़!!!
हेमंत का आग़ाज़!!!

हेमंत का आग़ाज़!!!

हल्क़ी भीनी मधम सी ठंड होने लगी,
जिस्म औ रूह की मीठी जंग होने लगी,

हेमंत की हवा मंद मंद सर्द होने लगी,
रुख़ों की लाली ज़रा ज़रा ज़र्द होने लगी,

सुबह सुबह की धूप मुलायम होने लगी,
अब चादर की जगह दुलाईयां होने लगी,

चाय की चुस्कियां भी मौज छूने लगी,
ताज़गी भरी बातें अब और भी होने लगी,

पहाड़ों का मज़ा खिड़कियां देने लगीं,
अंगड़ाइ में क़यामत मुरकियाँ लेने लगी,

शाख़ें भी शोख़ियों से और इतराने लगी,
लोच से भरी डालियां भी मुस्कुराने लगी,

इस बरस दरख़्त बारिश में नहाते रहे,
पत्तियां इन झोंको से बदन सुखाने लगी,

पहनावे में कम तो नहीं हैं मनुशरद भी,
ठंड में मगर बंडियाँ बाहर आने लगी,

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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