स्याह के कई छाया रंग बिखरे हुए हैं, हर इक छाया की अपनी अलग दुनिया है…जहां से जहां तक देख पा रहा हूं वहां पर ख़ासे गहरे कहीं हल्के मुख़्तलिफ़ अंधेरे रात को निखार रहे हैं…आसमां में स्याह के छाया रंग कुछ यूं दिख रहे हैं मानो आपस में इक रिश्ता हो जो गहरा हो रहा हो, वक़्त की धार पर ठहरा रहा हो…दूर सामने वादी में तारे टिमटिमाते हुए रात की स्याही को चार चांद लगा रहे हैं…
रात गहराती जा रही है, अंधेरे अब साफ़ साफ़ दिखने लगे हैं, इक तिलिस्म सा टूट रहा है, लगे यूं के अंधेरा कुछ बोल रहा है, शायद के सवेरा उसको ढांप लेगा और कुछ पलों के लिए उसे सोने देगा…अंधेरा मुंह उजाले सोना चाहता है…और वो सो गया…देखो उजाला हो गया!
सवेरे सवेरे भोर तले कहीं से टहलते हुए इतराते बादल आ गये और पहाड़ों की ऊंचाई से वादी में ढुलकते जा रहे हैं, यक़ायक ही पूरी की पूरी वादी पर बादलों की चादर बिछ गई, फिर हवाओं का रुख़ बदला और बादल की चादर लंबी होती हुई वापस ऊपर की ओर जाती दिखी…उनकी अठखेलियां कुछ यूं हो रही हैं जैसे कि ये कोई खेल हो…छुपन छुपाई का खेल! आंख मिचौली का खेल!
हम जहां बैठे हैं वहां पर नज़ारों की बाढ़ आई हुई है…कुछ यादें साथ हो चलीं वहीं बैठे बैठे…लम्हों को भरते रहना चाहिये अपने ज़हन में ऐसा मानना है उसका, पलक झपकने को ग़र लम्हा कहें तो ग़लत ना होगा…इन लम्हों को ताज़ा रखना होगा, जल्दी ही मुरझा जाते हैं अगर ख़याल ना रखा गया तो। कहता है कि यही लम्हा ले लीजिये इसे ना पहले जी सकते थे ना ही ये पल गुज़रने के बाद, इसे तो बस अभी इसी पल ही महसूस करना है और जितना गहरा उसे महसूस कर सकता है कोई उतना ही ताज़ा रह सकता है वो लम्हा…यानि याद! फिर उसने आसमां की तरफ़ देखा, हर इक तारा अपना लम्हा रहा है जी और उनके बीच की दूरी जो काली दिखती है वो है याद जिसमें उस लम्हें को यादों के क़ाबिल बनाये रखना है।यादें…इक पल पहले से लेकर ना जाने कितने पहले तलक…और याद रह गये हैं तो बस चंद लम्हें…याद रह जाने वाले लम्हें ‘अचानक’ कम ही होते हैं, उन्हें बड़ी मेहनत से यादों के लिये बनाना पड़ता है…यानि ख़ुशनुमा पलों का गुलदस्ता!!! फिर कहता है कि ख़ुश रहना क्या होता है? कैसे ख़ुश रहता है कोई? क्यों ज़रूरी है ख़ुश रहना…
…कभी कभी आपस की गुफ़्तगू में वो कहता है हम उदास और दिल दुखाने वाले बीते लम्हों को अपने से चिपका लेते हैं और उस गोंद को हमेशा लगाते रहते हैं जिससे कि कहीं वो उदास लम्हा हमारी गिरफ़्त से छूट कर भाग नहीं जाये…कहीं ये हमारा माज़ी तो नहीं जो हमें अब कचोट रहा हो?…और हम अपनी ग्लानि को बड़ी आसानी से उस बीते हुए लम्हें से चिपकाकर ख़ुद को ग्लानि मुक़्त करने की नाहक़ कोशिश करते रहते हैं ता-उम्र…जबकि इससे अलहदा जीवन को परिमार्जित करते रहना ही शायद विकल्प हो सकता है ग्लानियों से उभरने का, ऐसा लगता है उसे। इसीलिए, ख़ुशनुमा पलों का गुलदस्ता!
बस यही सोचते सोचते वो वापस आ गया अपनी दुनिया में जहां उसे ज़िंदगी ख़ुशनुमा बिताने का फ़लसफ़ा मिलता रहता है यानि हिमालय की पहाड़ियों और उनके बीच बसी वादियों में…वो रहे कहीं भी किसी भी कोने में इस दुनिया के…वो अपने बे-साख़्ता-पन में, कभी स्याह के मुख़्तलिफ़ रंगों को देखता है भौंचक्का हो कर, कभी देखता है बादलों की होड़ को और उस कौतूहूलता को जिसने उसे जिज्ञासा से भर रखा है…मंद मंद मुस्कुराते हुए सोचता है कि क्या बात है…वो ही वो घोंघा है!!!
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava