ज़िंदगी की सरजमीं पर...
दरख़्त के पास वाली दुकान!!! भाग २
दरख़्त के पास वाली दुकान!!! भाग २

दरख़्त के पास वाली दुकान!!! भाग २

जबसे उसको अपना माना मैंने,
इंतेज़ार बड़ी सज़ा है, ये जाना मैंने,
इंतेहा तो तब हुई, नाम ना जाना मैंने,
कैसा अनुभव, जिसे जीना जाना मैंने,
और ये भी कि दर्द दवा है, माना मैंने,
ये वो पल जिसमें ख़ुद को पहचाना मैंने,

मुहब्बत हूँ मैं, अब जा के जाना मैंने,
वो इक अहसास, भर रहा सांसें मुझमें,
उस ख़याल को कैसे क्यों छोड़ दूं मैं,
जिसने इश्क़ से वाबस्ता कराया मुझे,
ना होती दुकान ना मिलती मैं उससे,
ना उठती वो टीस जिसे ना सह सकी मैं,

क्या ख़ुद को बना रही थी मैं,
क्या ये भरम पाल रही थी मैं,
होने को उसकी हुई जा रही थी मैं,
ना चाहते ख़ुद को तड़पा रही थी मैं,
हाय रे! बांवली हुई जा रही थी मैं,
ख़ुद से ही ख़ुद बड़बड़ा रही थी मैं,

मुहब्बत जीती हूं, अब ये आलम है,
मुहब्बत ही है सब, मुहब्बत जानम है,
जिसको देख थम गयीं थीं मेरी सांसें,
जिसके लिये निकली, कितनी ही आहें,
चाहती थी वो छुपा ले मुझे अपनी बाहें,
उसी की आग़ोश में बेहोश हूं अरसे से,

नाम नहीं जाना उसका, मेरा अंबरीन है,
दुकान के बाद की कहानी क़ाफ़ी रंगीन है,
इधर लगे मुझे की उसकी आग़ोश में हूं मैं,
होश आया पता चला बैठी हूं पायदान पे,
उठ खड़ी हुई, चल पड़ी थोड़ी ठिठक के,
ग़ुमसुम जैसे होता हो कोई मदहोशी में,

बांवली सी चली जा रही घर(छात्रावास) को मैं,
क्या क्या गुल खिले दुकान पे ख़ुदा जाने,
होश में रही हूं तो जानूं भी, होश तो खोये,
अब आना ही कौन चाहता था होश में,
आलम तो ज़बरदस्त था बेहोश हो के,
बांवली सी जाने क्या जा रही थी सोचते,

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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