ज़िंदगी की सरजमीं पर...
दरख़्त के पास वाली दुकान!!! भाग ५
दरख़्त के पास वाली दुकान!!! भाग ५

दरख़्त के पास वाली दुकान!!! भाग ५

क्या चाहिये आपको, क्या माजरा है,
बोली मैं आहिस्ते से दुकानदार से,
कुछ नहीं बस आती हूं किसी को ढूंढ़ने,
दुकानदार ने पूछा आख़िर ढूंढ़ना किसे,
ग़र हुलिया बताओ तो मदद करूं मैं,
क्या जवाब दूं कि कौन है हूं ढूंढूं जिसे,

हुलिया बताऊं तो उसे क्या बताऊं मैं,
अचकचा के जल्द मैं चल दी वहां से,
अचानक जल्दी जल्दी पग भरते हुये,
जा ही रही थी मैं, के किसी शख़्स से,
बड़ी ज़ोर से टकरा गयी उसी वक़्त मैं,
धड़ाम से गिरी उसी दुकान के सामने,

पैर में ज़ोर की मोच आ गयी थी मेरे,
माफ़ी मांगने लगा जिससे टकराई मैं,
इतना दर्द था कि देख भी ना पाई मैं,
बड़ी सख़्ती से उस पर चिल्लाई मैं,
दिखता नहीं है क्या चोट लगी है मुझे,
ये नहीं होता के हाथ दे कर उठाओ मुझे,

सहारा दे उठाया उसने मुझे ज़मीन से,
ऐसा लगा काफ़ी मज़बूत हाथ हैं उसके,
बाहों में उठा कर बेंच पे बिठाया उसने,
कहीं चोट तो नहीं लगी, देखा ग़ौर से,
धूल जो चिपक गयी थी कपड़ों पे मेरे,
उसे झाड़ते हुए बड़बड़ाती जा रही थी मैं,

ऊपर से इक गहरी आवाज़ सुनी मैंने,
मुंह उठा के देखा तो देखती रह गयी मैं,
जिसकी तलाश में रोज़ आती थी मैं,
इक दफ़े तो लगा, टकराई मैं उसी से ,
सर चकराया तेज़ था समझ ना पाई मैं,
बस उठ के किसी तरह से चल पाई मैं,

अभी बस पहुंची थी आधे रस्ते ही मैं,
दुबारा सोचा झल्लाते हुए दिमाग़ ने,
इकदम ठिठक के वहीं पर रुकी मैं,
अरे!!! क्या वो वही था टकराई जिससे,
हां, शायद था वही ख़ुद ही बड़बड़ाई मैं,
बिजली सी कौंध गयी अचानक मुझमें,
और मैं वापस दौड़ पड़ी उसी हालत में,

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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