मन ही मन बड़े जतन ये गुन रही थी मैं
क़ाश मिल जाये, जिसकी बांवली थी मैं,
पर हुआ ना ऐसा गवां बैठी थी मौका मैं,
अपने ही ऊपर खीझ से जूझ रही थी मैं,
हताश मन रुकी धड़कन चल पड़ी थी मैं,
लगा ऐसे ना होगा मिलना, क्या करूं मैं,
इक गहरी दोस्त घर आयी थी मिलने,
मन की व्यथा कह ना पायी थी उससे,
पर दोस्त तो होते हैं दोस्त, समझ गये,
कहा कुछ भी नहीं मुझसे मेरी दोस्त ने,
हां, बातें करते हुए आहिस्ते पूछा उसने,
परेशां दिखती हो, क्या कोई ख़लिश है?
इतना सा कहने पर रोक ना पायी मैं,
उसके गले लग के फफक कर रोई मैं,
पर कह कुछ भी नहीं पायी मैं उससे,
भला कहती भी तो क्या कहती उससे,
के मुहब्बत हुई, पर मालूम नहीं किससे?
ये दवा तो नहीं जो मिल जाये दुकान पे,
मेरी इस दोस्त का नाम संगरीला है,
संगरीला को मेरी क़ाफ़ी चिंता है,
वैसे भी अंजान शहर अकेली हूं मैं,
हां, संगरीला यहीं की रहने वाली है,
उसकी पढ़ाई लिखाई यहीं की है,
मैंने दाख़िला यहां एम ए में लिया है,
संगरीला का परिवार कलकत्ता से है,
उसके पिता प्रोफेसर हैं अंग्रेजी के,
और बहुत नाम है उनका पढ़ाई में,
अच्छे खुले विचारों वाला परिवार है,
उत्तम है संगरीला भी पढ़ने लिखने में,
मेरी दोस्ती हुई उससे विश्वविद्यालय में,
थोड़ी राहत है संगरीला के आने से,
दिल चाह यही रहा है वो ना जाये,
अपने इस हाल पर ख़ुद हैरां हूं मैं,
और ये बात कह ना पा रही हूं मैं,
थोड़ी देर रुक कर वो बोली मुझसे,
देर हो रही है अब जाना है उसे,
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava