ज़िंदगी की सरजमीं पर...
दरख़्त के पास वाली दुकान!!! भाग ७
दरख़्त के पास वाली दुकान!!! भाग ७

दरख़्त के पास वाली दुकान!!! भाग ७

हां, बनारस शहर की ख़ास बात है ये,
यहां की बोली में गज़ब की मिठास है,
जब कभी लगे के दिल बड़ा उदास है,
तो उल्टी बहती हुई गंगा का साथ है,
सैर नाव पे इस घाट तक उस घाट से,
उसपे सवारी करने का अलग अंदाज है,

मैं पढ़ रही हूं काशी विश्विद्यालय में,
एम ए कर रही हूं लोक संस्कृति में,
वैसे हूं मैं सुंदर प्रदेश उत्तराखंड से,
और मेरा पैतृक निवास है लमगढ़ा में,
जो कि अल्मोड़ा ज़िले का क़स्बा है,
यहां के लोगों को जीने का जज़्बा है,

सरकारी विद्यालय से पढ़ी हुई हूं मैं
माता पिता वहीं पर शिक्षक भी हैं,
लमगढ़ा विद्यालय उच्च कोटि का है,
उसका स्थान उत्तराखंड में ऊंचा है,
मनोरम पहाड़ियों से उजला है ये,
पढ़ाई में अच्छी हूं बहुत अच्छी हूं मैं,

माता पिता ने भेजा आगे पढ़ने मुझे,
काशी में पढ़ने आयी हूँ मैं इसीलिये,
वैसे पढ़ाई लिखाई तो करनी ही है,
पर कोई ख़लल है दिल का दिमाग़ से,
जो लग जाये दिल तो दिमाग़ क्या करे,
उसपर हो जाये मुहब्बत, क्या बात है,

करूं क्या के उसकी ख़बर मिल जाये,
कोई भी तरक़ीब किसी काम ना आये,
लगा मुझे कि पूछ ही लूं दुकानदार से,
कैसे मिलेगा उसका पता बता दे मुझे,
अब तो ख़ासा वक़्त गुज़र गया मिले,
जाने कितने संभाल के रखे हैं शिक़वे,

जो आप ढूंढ़ रहे होते हो वो ग़र ना मिले,
तो लगे ऐसा के शायद कभी ना मिले,
पर तक़दीर में जो लिखा है वो होके रहे,
जो मिल जाये तो उसकी वक़त ना रहे,
ये सोच कर चुप बैठी हूं मैं भी इसलिये,
उसका मिलना लिखा है आख़िर मुझसे,

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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