ज़िंदगी की सरजमीं पर...
दरख़्त के पास वाली दुकान!!! भाग ८
दरख़्त के पास वाली दुकान!!! भाग ८

दरख़्त के पास वाली दुकान!!! भाग ८

फिर यूँ हुआ इक दिन विश्विद्यालय में,
पहला पहला दिन था उसके प्रांगड़ में,
मैं जा रही थी एम ए की कक्षा में बैठने,
समय हो चला, तेज़ी से जा रही थी मैं,
कक्षा के दरवाज़े पर होश गवां बैठी मैं,
उसे देख वहां पे उसी से टकरा बैठी मैं,

सामाज शास्त्र की कक्षा में गई थी पढ़ने,
टकरा के ज़ोर की चोट खा चुकी थी मैं,
लंगड़ाते हुए इक कुर्सी पर जा बैठी मैं,
जो आया ज़रा होश, होश गवां बैठी मैं,
टकराई जिससे उसी को ढूंढ़ रही कबसे,
देखा तो प्रोफेसर निकला, आया पढ़ाने,

अब तो इकदम ही मौन हो गयी मैं,
समझ ही ना आये कैसे क्या कहेंगे,
बात तो है करनी पर बात क्या करेंगे,
आख़िर है तो गुरु पढ़ाने आया है हमें,
इसके सिवा उसे कितना जानती हूं मैं,
यही के दिल से अपना मानती हूं उसे,

दिल धड़का धड़कता रहा देर तक ये,
सोचने को कुछ बचा ही नहीं अब तो,
तसल्ली बस यही थी कि उनसे पढेंगे,
जवां तो वो दिखते हैं आगे पता करेंगे,
ग़र ना हुई हो शादी तो बात हम करेंगे,
और जो शादीशुदा निकले क्या करेंगे,
दिल पर रख पत्थर उन्हें विदा हम कहेंगे,

हमने भी सोच लिया था इंतेज़ार करेंगे,
जल्दी ही क्या है जब उनसे हम पढेंगे,
आशिक़ी की है तो परवान हम चढ़ेंगे,
उनसे हो वाबस्ता उनकी कुछ सुनेंगे,
बुख़ार है इश्क़ का हमें, दवा वो करेंगे,
इत्मीनान से उनका इंतेख़ाब हम करेंगे,

सपने देखने का ये अलग ही मज़ा है,
सपने देखने में कुछ भी हो सकता है,
सपने में वो हमारे, हम हो गये उनके,
साथ दोनों ज़िंदगी के जोड़ेंगे तिनके,
जीता जागता ख़्वाब है, हम नहीं तोड़ेंगे,
और ख़्वाब में क़ोशिश कर , सच भरेंगे…

“मनुशरद”

Copyright © by Manish Kumar Srivastava

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