अगले दिन रोका उन्होंने देख कर मुझे,
वो बोले कि मतलब क्या है अलग से?
हमने कहा विषय कमज़ोर है मेरे लिये,
कहा उन्होंने ठीक है सोच कर बतायेंगे,
ग़र समय मिला तो वो ज़रूर पढ़ाएंगे,
कितनी प्रफुल्लित हो गयी थी मैं सुन के,
मैं तरक़ीब लगा लूंगी पढ़ने की उनसे,
पढ़ने की? शायद ठीक सुना होगा मैंने,
वक़्त बीत नहीं रहा था अब मुझसे,
कुछ ही दिन बीते, वो बात हुये हुवे,
के इकदिन पूछ लिया चल के मैंने,
के क्या कल से आप पढ़ायेंगे मुझे?
वो इन्कार ना कर सके अबकी दफ़े,
और हम पहुंच गये पढ़ने के बहाने,
क्या कैफ़ियत थी भगवान ही जाने,
कुछ ऐसी होती हैं दिल की हसरतें,
जिन्हें आप के सिवा कोई ना जाने,
बेइंतहा मुश्क़िल हैं के बयां हो पायें,
उससे ज़ियादा मुश्क़िल है ठहर जायें,
इस क़दर रफ़्तार होती है क्या कहें,
बह के संभलना कठिन है उस वेग में,
मेरी भी तबियत में रवानी थी बड़ी,
सारा तमाशा मैं सामने थी देख रही,
मुझे मेरे ही दिल की चिंता थी खड़ी,
क्या कहें समाज की हद थी रखनी,
उनकी तरफ़ से पहल भी नहीं दिखी,
मैं उदास और अनमनी सी हो गयी,
मेरी अनमनी की सुध उनको लगी?
इस धोखे में ना थी, सुनी के ना सुनी,
जानती हूं मैं रिश्तों की सीमाएं भी,
कुछ कहना चाहेंगे कह सकेंगे नहीं,
आख़िर वे गुरु हैं और मैं शिष्य ही,
पहल जो भी करनी है, मुझको ही,
शुरू शुरू की बात और होती है,
उन जज़्बों की बात और होती है,
कहने में ये बात आसान लगती है,
कहनी पड़े तो जान निकलती है,
जवाब का इंतेज़ार नहीं हो पाता है,
बस इन्कार का इंतेज़ार रह जाता है…
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava