कहते हैं कोशिशें कामयाब होती हैं,
कोई क़सर ना रखी क़ोशिश करने में,
निकले ही थे पढ़ के उनकी कक्षा से,
आवाज़ आयी, अरे अंबरीन ज़रा सुनो,
क्या कहा? क्या सही सुना था मैंने,
हाँ!!! मेरा ही नाम लिया था उन्होंने,
फ़ौरन पलट कर रुकी मैं चलते चलते,
फिर पलट कर पूछा मैंने, जी कहिये,
लड्डू तो फूट ही रहे थे मन में मेरे,
क्या काम है पूछना चाहती थी मैं,
बस इतना कह के ख़ामोश रही मैं,
सुनना चाहती थी जो कहना चाहते हैं,
कुछ समय पढ़ा ना पाऊंगा आहिस्ते बोले,
मुझे कुछ काम है, बाहर जाना है शहर से,
इतना सुन कर ही निराशा ने घेर लिया मुझे,
मैंने भी दिल कड़ा कर पूछ लिया उनसे,
कुछ दिन से मतलब? कितने दिन का है,
बोले, काम ज़्यादा है, यही कोई इक महीने,
जब आप किसी की आदत पाल लेते हैं,
मुश्क़िल होता है कि दिल उसे समझ सके,
बग़ैर उनके ये दिन किस तरह कट सकेंगे,
वहीं खड़ी खड़ी सोचने में लग गयी थी मैं,
नज़र उठा के देखा तब वो जा चुके थे,
उनके रूकने की वजह भी ना थी, चले गये,
उड़ती उड़ती ख़बर सुनी उनके जाते जाते,
अभी बस तीन चार दिन ही निकले थे गये,
पता चला, घर गये हैं शादी की बात करने,
उफ़्फ़ ये क्या सुना, टीस गुज़र गयी मुझमें,
शादी? किसकी शादी? ये कैसे हो सकता है,
क्या साथ मेरे भी ये नाइंसाफ़ हो सकता है,
हो सकता है क्या? मेरे सामने हो रहा है,
जिसे दिल दे बैठी वो किसी और का है,
और का है! मतलब! क्या ये हो चुका है,
नहीं ऐसा नहीं है दिल को समझाया मैंने,
अभी तो गये हैं बस बात करने घर पे,
पता नहीं कि क्या होगा इसके आगे,
कर थोड़ा इंतेज़ार थोड़ा धीरज धर के,
बस इतना ही सोचा और समझा मैंने…
“मनुशरद”
Copyright © by Manish Kumar Srivastava